Friday, August 9, 2019

द्रौपदी की नियति


मूल ः विजय चालिसे
अनु ः गोपाल अश्क

(भारत–नेपाल कथा संगम (२०१९), सम्पादकः डा. राजेन्द्र परदेशी, डा. भाष्कर शर्मा र रामकुमार पण्डित, परिन्दे प्रकाशन दिल्ली मा सङ्ग्रीहीत हिन्दीमा अनुदित मेरो कथा । प्रकाशक, सम्पादक विशेषतः साहित्यकार भाइ रामकुमार पण्डित सहित अनुवादक साहित्यकार मित्र गोपाल अश्क सबैला धन्यवाद ! )

आज याङ्जेन अपने दूसरे पति का स्वागत करने के लिये अपने को मानसिक रूप से तैयार करने की कोशिश मेंं लगी हुई है । उसका शरीर तो पति की चाहत पूरा करने के लिये हर वक्त किसी निर्जीव वस्तु की तरह अपने आप को तैयार कर सकता है । लेकिन उसका मन और उसके मन के अंदर का स्त्री का स्वाभिमान इस बहु पति भोग की स्थिति को कैसे सह पायेगा ? वह इस भावना से खुद को कैसे अलग कर पायेगा कि वह इस देह व्यापार करने वाली स्त्री से अलग है । याङ्जेन इसी मानसिक द्वंद्व में पड़ी हुई है ।

वह इच्छा और खुशी से नहीं बल्कि परंपरागत प्रचलन और आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति का शिकार होकर अपने पहले पति को नमक ढोने के लिये भेजकर दूसरे पति की बाँहों मेें भर जाने के लिये विवश हुई है । एक तरह से युद्ध की मानसिक पीड़ा भोग रही है । उसे याद आता है–अभी तो छ महीने ही हुये हैं उसकी शादी के । छ महीने  पहले ही तो उसकी शादी उसके पहले पति के साथ ‘देमछयाङ्’ विधि संपन्न होने के बाद हुई थी  और वह इस घर में आई थी । उसने देमछयाङ् के पहले और तिछयाङ् के बाद अपने उसी पहले पति पेमा को अपना सबकुछ मानकर अपने आपको समर्पित किया था । शादी की मूल विधि के पहले ही उसने अपने आपको एक पत्नी के रूप में समर्पित किया था । एक आम औरत की तरह उसने भी पेमा के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष की कल्पना नहीं की थी । एक हिसाब से उसने अपने समाज का वह प्रचलन भी भुला दिया था । वह याद करना भी नहीं चाहती थी ।

अब वह याद करे या न करे ।  या फिर  भूल ही क्यों न जाय ।  मगर वहाँ एक समाज था, एक परंपरा थी । और उस समाजिक परंपरा को मानना उसकी मजबूरी थी । कहने का मतलब यह है कि वह देमछयाङ् बिधि संपन्न करके पेमा की पत्नी के रूप में उसके घर में आने के बाद वह केवल पेमा की ही पत्नी नहीं थी, बल्कि उसके अन्य तीन भाईयों की भी पत्नी हो गई थी । वह उन लोगों की भी बतौर सामाजिक मान्यता प्राप्त पत्नी हो गई थी । उसके ऊपर न केवल पेमा का बल्कि और तीन पतियों का मालिकाना हक कायम हो चुका था । उसकी नारीत्व का चार भागों में बँटवारा हो चुका था । शरीर को अलग–अलग हिस्सों में सौंपना शायद कठिन न हो, लेकिन उसके अंदर जो सनातन नारी हृदय था, उसका क्या करे ? उसे वह कैसे अलग–अलग हिस्सों में बाँट दे ? अब हृदय शरीर तो है नहीं कि उसे अपनी सुविधा के मुताबिक उलटा–पलटा दिया जाय या रौंद दिया जाय । लेकिन यह स्थिति और मानसिकता आज याङ्जेन के सामने आ खड़ी थीं । उसके चाहने या न चाहने से क्या होता है ? अपने पति पेमा, को बिदा करके उसके मझले भाई को पति के रूप में स्वीकार करना था और उसकी इच्छा की वेदी पर अपनी देह सौंपनी थी । उसे अपने आपको उसके मन के मुताबिक ढालना था । कहने का मतलब यह है कि आज से उसपर दूसरे पति का अधिकार था, हक था । और उसी हक और अधिकार के चलते वह एक याम के लिये उसका उपभोग्य सामग्री बन गई थी । आखिर क्या अंतर है उसमें और उसके पति के द्वारा ऊन देकर लाये हुये नमक के अस्तित्व में ? नमक एक वस्तु है जिसे हर कोई प्रयोग कर सकता है । जैसे कि उसे पेमा के तीनों भाई अपनी इच्छा के अनुसार एक–एक याम के लिये उपभोग कर सकते हैं । कल जब उनका मन भर जाय तो वे अपनी पैतृक संपत्ति और उसे छोड़कर किसी और के साथ अलग हो सकते हैं । वह केवल उनकी पैतृक संपत्ति उपभोग करने वाली एक शर्त ही तो है ।
उस दिन वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि वह खुशी हो या दुःखी । उस दिन उसका तिछ्याङ् (सगुन) आ रहा था । उसके गाँव के बगल वाले गाँव जोरखोल्सी से उसकी शादी का सगुन आ रहा था । अर्थात् पेमा फुंजो के पिता याङ्जेन को बहू बनाने के लिये विधि अनुसार ‘वा’ (सगुन) ला रहे थे । जिस हाँड़ी पर  वह ‘वा’ रखा हुआ था उसे याङ्जेन के पिता अस्वीकार कर ही नहीं सकते थे । क्योंकि इसके पहले वे इस बात के लिये राजी हो चुके थे । उनके सहमत होने के बाद ही यह विधि संपन्न की जा रही थी । याङ्जेन के पिता ने उस हाँड़ी की शराब पीते ही पेमा फुंजो के साथ उसकी शादी तय हो गई । ‘तिछ्याङ’ की विधि इस कुछ इस तरह से पूरी हुई थी ।
–‘क्या सोच रही हो याङ्जेन ?’ अभी से पेमा को याद करके हमे भूल गई क्या ? क्या सोचती हो ? तुम तो केवल एक पेमा की ही नहीं, बल्कि एक ही बार में चार–चार पुरुषों की पत्नी हो गई ! खूशनसीब हो तुम ! छाङज्यू की आवाजा सुनते ही याङ्जेन अंदर से काँप गई ।
इसी बात से तो वह गली जा रही थी । उसे यही चिंता खाई जा रही थी कि आखिर वह किस तरह चार–चार पतियों को बहला पाएगी ? उसने बचपन में पाँच पांडव की कहानी सुन रखी थी । उस कहानी में उसने सुना था कि द्रौपदी के पाँच पति थे । उस वक्त उसे सोचा भी था कि द्रौपदी को पाँच पतियों के बीच में रहते हुए कैसा लगता होगा ? बच्ची ही तो थी वह । खुश भी होती थी सोचकर । उसे लगा था कि पाँच–पाँच पतियोंं का प्यार पाना कोई कम खुशी की बात नहीं है । खुशनसीबी है यह । आज पाँच तो नहीं लेकिन चार–चार पतियों की एक साझा पत्नी की हैसीयत में खड़ी हो गई है । दो तो छोटे ही हैं, उसने सुना था । एक दस साल का है और दूसरा बारह साल का है 
। अभी उन्हें जवान होने में दो–चार साल लगेंगे । लेकिन दूसरा पति तो एकदम गबरू जवान है, पेमा की तरह ।

याङ्जेन को बहुत बुरा लगा था – यह किस तरह की परंपरा का शिकार होना पड़ा है मुझे और मेरे समाज की लड़कियोंं को । ऐसा लगता है कि जानवरों का समाज है यह ! अब क्या सोचना है छाङ्ज्यू ! यह केवल हमारा ही चलन नहीं है । केवल मेरी ही जिन्दगी में विपत्ति नहीं आई है ? आज मैं शिकार हुई हूँ, कल तुम सभी लोगों को इस चलन का शिकार होना पड़ेगा । यह नियति भोगनी पड़ेगी ।’ याङ्जेन ने अपने बचपन की सहेली छाङ्ज्यू से अपनी पीड़ा व्यक्त की ।

–‘ देखो ! मैं नहीं मानती हूँ ऐसी परंपरा ! ऐसी भी कहीं परंपरा होती है ? कि एक लड़की किसी एक घर के सारे मर्दों की पत्नी बने ! इससे तो अच्छा कि मैं मंदिर चली जाऊँ, भिक्षुणी बन जाऊँ ! सुनती हो,मैं तो बहुतों की पत्नी नहीं बनूँगी ।’ छाङ्ज्यू याङ्जेन की तरह नहीं है । थोड़ी विद्रोही स्वभाव की है । जो उसे पसंद नहीं होता, उसके लिये वह लड़–भीड़ जाती है । गाँव के स्कूल में साथ–साथ पढ़ने–रहने के बावजूद उनके स्वभाव नहींं मिलते । एक लजवंती झार की तरह है, जो किसी के देखने भर से शर्माकर अपने आप में सिमट जाती है । और दूसरी एकदम प्रतिवाद करनेवाली, किसी का दबाव नहीं सहने वाली और विद्रोह करने वाली , रणचंडी की तरह ।

‘काश ! मैं भी छाङ्ज्यू की तरह विद्रोह कर पाती ! लेकिन सभी कहाँ विद्रोह कर पाते हैं ! वह मन ही मन सोचती जा रही थी । शायद इसी स्वभाव के कारण उसने अपने पिता के निर्णय और सामाज की परंपरा के आगे अपने आप को समर्पित कर दिया था । शायद उसने एकांकी विद्रोह को आत्मघात माना था । बीतते समय के साथ प्रारंभ में सपने से लगनेवाले दिन को भी कड़वा हकीकत मानकर गुजारना पड़ता है । लेकिन कभी–कभी अपने ही मन में सवाल पैदा हो जाता था , –‘ क्या यही है मेरे नारी जीवन की स्वाभाविकता ? क्या अलग रुचि, अलग स्वभाव और अलग प्रकृति के विविध पुरुषों को धारण करने से उत्पन्न होनेवाली जटिलताओं के प्रति हर वक्त त्रसित और शंकित होकर तलवार की धार की जैसी संतुलन बनाकर जीना ही मेरे जीवन की स्वाभाविकता है ? क्या यही है मेरे जीवन का सामान्य रूप ?’
–‘ माँ ! मेला देखने जाऊँ ?’ गोम्बा में आज मेला लगा हुआ है ।  है न ?’ उसकी पहली सिर्जना पाङ्जेन अनुमति मांगती है ।
–‘ अब जाना चाहते हो तो जाओ, मगर अंदर मत जाना । लोगों को अच्छा नहीं लगेगा ।’ बेचारा छोटा–सा बच्चा यह बात समझ नहीं पाता है कि अंदर जाने से लोगों को क्यों अच्छा नहीं लगेगा ? उसी सोच में उसने ‘आखिर क्यों’ सवाल भी न कर सका ।

याङ्जेन को अपनी अन्य संतानों से ज्यादा इस पाङ्जेन से ज्यादा लगाव है । उसके प्रति ज्यादा प्रेम है । चाहे जो कुछ भी हो, यह उसकी पहली सिर्जना है । और उसकी इस पहली सिर्जना से समाज या उसका परिवार अब चाहे जो समझे, कोई फर्क नहीं पड़ता । वह इसमें हीनता की कोई बात नहीं पाती । हाँ,उस वक्त उसने थोड़ी बुद्धिमता से काम नहीं ही लिया था ।
पिता के द्वारा तिछयाङ स्वीकार करने के बाद सामाजिक रूप से उसकी शादी पेमा फुंजो के साथ होने की पहली विधि पूरी हई । प्रचलन के अनुसार ही उसके होनेवाले पति पेमा को ससुराल आने–जाने का अधिकार प्राप्त हो गया । समाज ने उसे तिछयाङ विधि पूरी होते ही होनेवाली पत्नी के साथ सहवास के लिये रात गुजारने का अधिकार तो दे ही दिया था ।

पिघले हुए पीले सोने की तरह उसका गोरा रंग, सुडौल शरीर, लंबे बाल और सुंदर चेहरा ने याङ्जेन को अपनी तरफ आकर्षित किया ही था । वह भी उस सुंदर युवक के प्रति आकर्षित हो गई थी । वह भी काफी सुंदर युवक था । मूँछ हल्की–हल्की उगने लगी थी । और वे दोनों एक दूसरे की तरफ आकर्षित क्यों न हों ? आखिर वे एक दूसरे के होनेवाले जीवनसाथी थे । संसार द्वंद्वात्मक है, मैथुनजन्य है और इसके सारे पदार्थ स्त्री–पुरुष के रूप में विभाजित हैं । अर्थात् प्रकृति और पुरुष !  प्रकृति और पुरुष अर्थात् स्त्री और पुरुष की आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूल आधार है । और स्त्री पुरुष के बीच की अन्तर्निहित चुंबकिय शक्ति से आकर्षित होना अस्वाभाविक भी तो नहीं था । उस पर उन्हें सामाजिक मान्यता भी प्राप्त थी ।

पेमा के साथ शादी करते समय याङ्जेन के मन में अपने अन्य तीन पतियों से पत्नी का अधिकार मांगने की सोच भी नहीं पनपी थी । इतना ही नहीं, उस वक्त उसने यह भी नहीं सोचा था कि उसके आकर्षण और सहवास की परिणति ‘संतान’ को समाज में तुच्छ होकर जीना पड़ेगा और समाज की कुदृष्टि का शिकार होना पड़ेगा । उसने प्रेमिल मनस्थिति में पेमा के अनुरोध को इजाजत दी थी । उन लोगों ने ‘तिछयाङ्’ के बाद पूरी की जानेवाली शादी की मुख्य विधि ‘देमछयाङ’ को पूरा किये बिना समागम किया था जो उसकी इजाजत के बगैर नामुमकिन था । अगर ऐसा होता भी तो सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं होता ।

कभी–कभी तो जोर–जोर से चिल्लाकर इस समाज से पूछने का मन करता है,–‘ तिछयाङ् के बाद और शादी के पहले सहवास और शारीरिक संसर्ग करने की इजाजत देने वाला यह समाज उसी के परिणति के रूप में जन्मीं संतान को ऊँचा दर्जा क्यों नहीं दे सकता ? क्यों ‘थेम्बा’ कहकर तुच्छ समझता है ? इस समाज के पास उसकी ही दी गई इजाजत से जन्म लेनेवाली संतानो के साथ अन्याय करने का क्या अधिकार है ? मगर उसका मौन चीत्कारयुक्त प्रश्न मन में ही रह जाता है । वह अपने आप को उद्वेलित करने के अलावा कुछ नहीं कर पाती है । अपने इस प्रश्न को कोई अर्थ नहीं दे पाती है ।

बेचारा उस अबोध बालक को क्या पता कि उसकी माँ की शादी की विधियों में तिछ्याङ् के बाद पूरी की जानेवाली मुख्य विधि ‘देमछ्याङ’ पूरी होने से पहले ही वह जन्मा हुआ है और इसलिये वह समाज में दूसरे दर्जे का नागरिक है । यानि कि अवैधानिक संतान है । इसलिये वह समाज में तुच्छ समझा जाता है । अपनी माँ की अन्य संतानों की तुलना में भी तुच्छ ! ऐसी अवस्था में जब वह अबोध बालक छोटा–छोटा अबोध सवाल करता है तो उसकी माँ दर्द से भर जाती है । अन्दर ही अन्दर टूट जाती है । सोचती है,–इसमें इसका क्या दोष ? दोष तो मेरा है, इसके पिता का है । हम दोनों का जो हमने इसे समान मान्यता नहीं दिला सका । सच पूछिये तो यह हमारे समाज का दोष है !

उसे अच्छी तरह याद है–तिछ्याङ् के ठीक एक साल के बाद ‘थेम्बा’ के रूप में जन्मी उसकी पहली संतान के बाद ही उसकी ‘देमछ्याङ’ नामक विधि सम्पन्न हुई थी । ‘देमछ्याङ विधि मेंं उसके पिता के घर आनेवाले लोगों में दो लोग ‘याङजी’ और ‘बोकका’ आगे–आगे थे । याङ्जी और केकल कहलानेवाली शराब का मटका लिए हुए  उन दो लोगों के पीछे दो लोग बाजा बजाने वाले थे और उनके पीछे महिलाओं और पुरुषों की लंबी कतार थी । देमछ्याङ का स्वागत अर्थात् सुरछ्याङ करने के लिए याङ्जेन की माँ और कुछ अन्य काकी और दादियों को शराब की हाँड़ी लेकर कुछ दूर आगे तक आना पड़ा था । उन लोगों ने धूप बत्ती जलाकर अपने साथ लाये गये ‘छ्याङ’ नामक शराब की बूँदे बारातियों के ऊपर छरका था । उसके बाद वे शराब पीने का दावत देते हुए उन्हें घर ले गये थे । घर में लेजाकर स्वागत उनके गले में गमछा पहना देने के बाद ‘देमछ्याङ’ अर्थात् शादी की विधि संपन्न हुई थी । याङ्जेन उस वक्त घर के एक कोने से ये सबकुछ देख रही थी । और उसे अच्छा भी लग रहा था ।
–‘अरे सखी याङ्जेन ! तुमको तो लग रहा होगा कि कब यहाँ से चली जाऊ ! कहीं आज ही भाग जाने को सोच तो नहीं रही ! कहीं ऐसा तो नहीं कि आज ही भाग जाओगी ! उसकी सहेलियों ने उसे परेशान कर रखा था । उसके मायके में तीन दिनों तक नाच–गान होता रहा ।
–‘ क्या उत्पात मचा रखी हो तुम लोग । तुम लोगों की भी बारी आएगी । क्यों बेचैन हुई जाती हो ? याङ्छेन अपनी सहेलियों को डाँटा जरूर था लेकिन मन ही मन वह रोमांचित हो गई थी । पेमा को देखने की इच्छा तीव्र हो चली थी । ‘तिछ्याङ’ के बाद ससुराल में ही आकर लंबे समय तक सहवास सुख देने वाला उसका पेमा ‘थेम्बा’ के रूप में  पहली संतान के जन्म के बाद नहीं आया था । ‘देमछ्याङ’ में शादी करनेवाले लड़कों का आने का रिवाज नहीं था । भला वह भी क्यों आता !

‘देमछ्याङे’ की विधि संपन्न होने के बाद तीन दिनों तक भोज और नाच गान हुआ और उसके बाद दुलहन बिदा हो गई । याङ्जेन नया घर, नया परिवार और नया परिवेश में प्रवेश की । उसके अपने मायके का परिवार और परिवेश एकदम अलग था । उसके पिता के अन्य कोई भाई नहीं होने से उसकी माँ का एक ही पति था उसका पिता । कहने का मतलब यह है कि  याङ्जेन और उसके भाई का एक ही पिता था । परिचय के क्रम में उसने  जाना कि उसके मायके और ससुराल के परिवेश में काफी भिन्नताएँ हैं । दोनों परिवारों में कहीं कुछ नहीं मिलता । वैसे यह स्थिति उसके लिए अपरिचित नहीं थी । उसने अपने मायके में अन्य लोगों के घर–परिवार में इस तरह का वातावरण देखा था । संयोग ही कहना पड़ेगा कि उसने अपने घर–परिवार में ऐसा नजारा नहीं देखा । क्योंकि उसके बाप–दादाओं के एक ही पुत्र थे जिससे इस तरह का माहौल देखने को नहींं मिला । इधर उसका पति तो था ही । इसके अलावा उसकी सास के अन्य तीन लड़के और दो लड़कियाँ थीं । सास के पति अर्थात् उसके ससूर, वे भी दो थे । उसने परिचय के क्रम में यह भी जाना कि समाज के नियम और विधि के अनुसार सास–ससूर के अन्य तीनों लड़Þके उसके पति स्वतः हो गये । पेमा अपने अन्य पतियों को पहली बार देख रही थी । उसका दूसरा पति पेमा से उम्र में थोड़ा छोटा होने के बावजूद उसके ही तरह लक्का जवान और आकर्षक नजर आ रहा था । बाकी के दो तो बच्चे से नजर आ रहे थे । एक तो अभी दस का दिख रहा था और दूसरा शायद बारह वर्ष का किशोर था ! शायद वे अबोध किशोर नवआगन्तुक महिला की उपस्थिति को अजीब मान रहे होंगे । और यह नवआगन्तुक महिला उनकी भी पत्नी है, यह जानकर भी पत्नी का सही अर्थ समझ नहीं पा रहे होंगे । पत्नी भोग की कल्पना तो उनके जेहन में दूर–दूर तक नहीं होगी । उसकी सास ने अपनी उन चार संतानों को अपने पहले पति से पैदा की थी या बाकी के पतियों से, यह वही जानती थी । लेकिन प्रचनल यह था कि संतान चाहे जिससे जन्में, वह ज्येष्ठ की ही कहलाती थीं । इसलिए इसमें कोई बखेरा नहीं था, कोई लड़ाई नहीं थी । याङ्जेन को इस बात की फिक्र भी नहीं करना था और भेटघाट के क्रम में उसे इस बात से परिचित भी नहीं कराया गया ।

दिन बीतते चले गये । देमछ्याङ् की विधि संपन्न होने के बाद दो समधियों का मिलन होता है । पेछयाङ् की विधि संपन्न होने के बाद कुछ दिनों तक मायके में रही याङ्छेन ने उसके बाद अपने मायके की दहलीज पर पैर भी नहीं रखा है । पेछ्याङ के बाद अपने मायके से तिलक दहेज के साथ यहाँ आने के बाद उसे मायके जाने का वक्त ही नहीं मिला । सात–आठ लोगों का परिवार की देखभाल उसे ही करनी पड़ती है । उसका एक पति भोट, दूसरा खर्क और तीसरा गाँव से दूर खेतीपाती में होने के बावजूद घर में रहे सास–ससूर और खुद की दो–दो संतानों की देखभाल उसे ही करनी पड़ती है । घर के और अन्य इधर–उधर के कामों से उसे फुर्सत नहींं मिलती थी । वह चाहकर भी मायके जा नहींं सकी थी ।

आज वह अपने चार पतियों में से दूसरे के साथ बाँटी जा रही है । इससे वह काफी उदास है । उसे अच्छा नहीं लग रहा । सुबह ही उसने अपने ज्येष्ठ पति, जिसे वह वास्तव में अपना पति मानती थी, नमक का व्यापार करने के लिये बाहर भेजा है । तिछ्याङे से लेकर आज तक के प्रत्येक सहवासों में पेमा ने उसे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से पूर्ण रूप से संतुष्टि दी है । उसका प्यार पाकर वह संतुष्ट थी, कोई शिकायत नहीं थी ।

–‘अपनी देखभाल अच्छी तरह करना पेमा ! सातू भूजा जो भी मिले, भरपेट खाना ! देखना, भूखे मत रहना ! याङ्जेन ने अपने पति पेमा को कहा था और विदा किया था ।
–‘ तुम बिल्कुल चिंता मत करो ! आज से तुम्हार ख्याल मेरा भाई साङ्ले करेगा । उसको ही पति मानना । आराम से रहना । मैं भी आ जाऊँगा ।’ पेमा ने भी उसे समझाते हुए कहा था ।                   

पेमा को विदा करने के बाद याङ्जेन सारा दिन अपने आप को घर के काम धंधों में व्यस्त रखा । मगर मन में शांति नहीं थी । रह–रहकर उसकी आँखों के सामने पेमा और साङ्े का चेहरा तैर जाता था और ये दो चेहरे एक आपस में घूलते नजर आते थे । एक से लगते थे ये दो चेहरे । फिर भी एक नहीं लग पाते । वैसे याङ्जेन ने अपने को अपने विभिन्न मर्दों के बीच बाँटने का मजबूत इरादा कर लिया था । मगर इसके बावजूद उसका इरादा कामयाब नहीं हो पा रहा था । यह कैसे संभव था कि एक रात पहले अपने एक पति की बाँहों में समाई और अपने को समर्पित की हुई नारी सुबह होते ही दूसरे पति की बाँहों में उसी सहजता और मुहब्बत से समा जाय । वह खुद से सवाल करती है और यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि आखिर उसके जेहन में भी उसके ससूर और गाँव के बहुपति वरण करने वाले अन्य लोगों की तरह सोच क्यों नहीं पनप पाती है । वह यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि यदि स्वेच्छा से बहुतों की बाँहों में समाना वेश्यावृत्ति है तो बहुतों की पत्नी होना क्या है ? उस और इस स्थिति में क्या तात्विक अन्तर है ? माना कि समाज ने इस बात की छूट दे रखी है, मान्यता दे रखी है । लेकिन क्या मैं कल से चार–चार पतियों के सहवास के बाद आज की तरह आप को सहज और सरल देख पाऊँगी ? आज का यह समाज इस तरफ क्यों नहीं देता है ? यह समाज यह क्यों नहीं सोचता कि पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे को रोकने के लिये किया गया यह आविस्कार नारी–अस्मिता पर कितना बड़ा आघात पहुँचाता है ? क्या समाज की परंपराएँ और प्रचलन को भी तो समय के अनुसार परिवर्तन होना चाहिये ? हाँ, कल लड़कियों की संख्या कम थी और इस तरह की बहुपति–प्रथा कायक रखने की मजबूरी थी । मगर आज तो यह समस्या नहीं है । लड़के–लड़कियों की जनसंख्या समान ही है । इतना ही नहीं, अब तो पैतृक सम्पत्ति की स्थिति भी पहले की तरह नहीं है । तो फिर क्यों नहीं यह प्रचलन बदल रहा ?

याङ्जेन अपने ऊपर सवालों के हो रहे लगातार विस्फोटन से थर–थर काँपने लगती है और उसकी खामोशी ने उसे दबोच रखा है । उसके सवाल सवालों में सिमट कर रह जाते हैं ।
–‘याङ्जेन ! सोना नहीं है क्या ? घर का सारा काम–धंधा तो हो ही चुका होगा न !’ इच्छा न होने के बावजूद उसने आज घर में घी का दिया जलाया है । उसने भी पहले पति को व्यवसाय करने के लिए बाहर भेजने और दूसरे पति का स्वागत करने के क्रम में इस तरह घी का दिया जलाने के प्रचलन को स्वीकार किया है । लेकिन उसके मन में अब भी पेमा ही है । उसके दूसरे पति साङ्गे की कहीं कोई बात नहींं है । कहने का मतलब यह है कि याङ्जेन ने साङ्जे को मन से अपना पति नहीं माना है । अन्य दो नाबालकों की तो कोई बात ही नहींं है । उधर साङ्जे भी याङ्जेन के मन के महाभारत से पूरी तरह बेखर था । वह तो यही समझ रहा था कि याङ्जेन ने घी का दिया जलाकर एक की बिदाई और दूसरे का स्वागत करने की परंपरागत विधि को संपन्न करके अपनी स्वीकृति दे डाली है । वह तो यही समझ रहा था कि याङ्जेन ने अपने आपको पूरी तरह से समर्पित कर दिया है । याङ्जेन थी भी काफी खूबसूरत । साङ्जे उसकी खूबसूरती का दीवाना हो गया था । वह उस घड़ी का इन्तजार कर रहा था कि कब उसका बड़ा भाई कहीं जाये और याङ्जेन को वब भोगे । याङ्जेन को भोगने की कल्पना में ही उसने अपने दिन और रातें गुजारी थी ।

हालाँकि एकबार उसने यह सोचा भी था कि वह अपनी इच्छा के मुताबिक शादी करेगा और अपने बाप दादाओं की सम्पत्ति की लालच छोड़ देगा । आखिर कितनी है सम्पत्ति ! जीने के लिये कोई न कोई उपाय निकाल ही लेगा । कुछ न कुछ हो ही जायेगा । इतना ही तो है कि समाज के नियम के मुताबिक घर में रहकर एक को ही साझा पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करने पर पैतृक सम्पिित्त से हाथ धोना पड़ेगा । लेकिन इसके बदले अपनी इच्छा मुताबिक पत्नी की प्राप्ति और उसके साथ जीवन भर का आनंद का लाभ भी तो है । अपनी, केवल अपनी पत्नी और अपनी संतान और केवल अपना ही परिवार ! अर्थात् अपने अस्तित्व और अपनेपन के साथ जीने का मजा ! अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जिन्दगी बिताने का आनंद । कहीं से कोई खतरा नहीं । कहीं से कोई मलाल नहीं । लेकिन याङ्जेन की खूबसूरती और आकर्षण ने उसे ऐसा नहीं करने दिया था ।  याङ्जेन की खूबसूरती और आकर्षण मेंं ही  रहने का कोई इरादा भी नहीं था । वह उसे एक याम तक भोगने के बाद किसी दूसरी औरत को अपनी पत्नी बनाकर और अपना धन सम्पत्ति छोड़कर अलग भी रह सकता था । पुरुषों मिली यह आजादी फिर घर की बड़ी बहू को नहीं थी । वे तो अपनी देह से लेकर मन को रोटी की तरह टूकड़ा–टूकड़ा करके बाँटने के लिये मजबूर थीं ।

‘......’ साङ्जे का ‘सोना नही है क्या’ के सवाल ने याङ्जेन को अंदर से हिलाकर रख दिया था । उसको साङ्जे की नये सहवास की व्यग्रता ने कंपित कर दिया था । उसके मन में ज्वार उठ गया था,–‘ क्या समझते हैं ये मरद अपने आपको ? क्या नारियाँ इनकी मदान्धता शमन करने और इनकी वासना के कब्र पर सो जानेवाली लाश हैं ? इनके बिस्तर की चादर हैं ? सवाल तो काफी विस्फोटक था । मगर वह कुछ नहीं बोल सकी । मन के ज्वारभाटा को मन में ही दबा रखा ।

अब तक कोई जवाब न पाकर साङ्जे उसके करीब आ गया है । कमरे में रोशनी फैली हुई है और अँगीठी के सामने याङ्जेन बैठी हुई है । परिवार के सारे लोग खर्क में हैं । अर्थात् वहाँ किसी भी भौतिक उपस्थिति नहीं है । किसी की भी जीवित अस्तित्व नहीं है । दीवारों से सटा तख्ता है । पूर्ववाले तख्ते पर मूर्तियाँ रखी हुई हैं । भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर और तारा आदि की आकर्षक मूर्तियाँ ! एक दूसरे तख्ते पर याङ्जेन के द्वारा धो माँजकर रखे गये बर्तन हैं । वे बहुत ही सलीके और कलात्मक ढंग से रखे गये हैं । नीचे जमीन पर चट्टाई, गद्दा, भुवेदार बिस्तर बिछाई गई है । कमरे का वातावरण वैसे ही मादक, मोहक और आकर्षक है ।  वैसे वातावरण की यात्रियों में रोमांचकारी अनुभूति का होना अस्वाभाविक नहीं था । और साङ्जे तो ऐसे ही परिवेश, वातावरण और रोमांचकारी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था । वैसी मानसिकता और वातावरणीय उत्प्रेरणा ने साङ्जे को व्यग्र बना दिया था, जो स्वाभाविक था । वह याङ्जे के करीब बैठ जाता है उसकी उँगलियाँ धीरे–धीरे याङ्जेन के अंगों के साथ खेलने लगती हैं । सिर,मुँह, गाल और होठों से गुजरते हुये उसकी उंगलियाँ उसके संवेदनशील अंगों का भी अतिक्रमण करने लगती हैं । साङ्जे की उंगलियाँ और उनकी गतिविधि एवं चेष्टाएँ उसे अच्छी नहीं लगतीं । किसी सर्पदंश के समान लगती हैं । ‘क्या कर रहे हैं ?’ जाइये, आप सो जाइये ! मुझे यहीं रहने दीजिये ! मैं आप सभी की बाँहों में भर के नहीं जी सकती । एक के अलावा दूसरे की पत्नी होकर जीने से बेहतर है मर जाना । मैं भी मर जाऊँगी ।’

 याङ्जेन का अप्रत्याशित आक्रोश और विद्रोह देखकर साङ्गे कुछ बोल न सका । वह भौचका रह गया । सोचने लगा,–‘ चलो, कोई बात नहीं । आज पहला दिन है । पहली रात की असहजता है । कल तो ठीक ही हो ही जाएगा ।’ उधर याङ्जेन सो नहीं सकी । रात भर जगती रही । वह सोच रही थी,–‘ आज तो उसने अपनी अस्मिता की रक्षा कर ली है.... लेकिन .... कल ? उसके अंदर आशंका तो था लेकिन उसके साथ–साथ  प्रवल आत्मविश्वास ं भी था–‘ऐसे रोटी की तरह बाँटकर मैं जिन्दा नहीं रह सकती ।’

००                                             
 

Thursday, January 10, 2019

दिव्योपदेश प्रति कति इमान्दार छौं हामी ? पृथ्वीप्रतिपादित नीतिको उपेक्षा आजको विचलन !



(प्रकाशोन्मुख रचना)
नेपाली समाज दिनप्रतिदिन विभाजन, विखण्डन, परनिर्भरता र विद्वेषको दिशातर्फ अग्रसर भइरहेको देखिँदैछन् । प्रधानमन्त्री स्वयम्ले नै “जनता एकजुट भएको बेला विखण्डनको कुरा गर्ने, धार्मिक विद्वेष फैलाउनेहरूबाट सबै सजग हुनपर्छ । जनता र विभिन्न जातिको नाममा मुलुकमा आपसी सद्भाव खल्बल्याउन खोज्नेलाई सरकारले छाड्दैन ।” भनेर राष्ट्रिय सुरक्षा परिषद्को बैठकमा सार्वजनिक रूपमैं बोल्नु पर्ने अवस्था आउनु भनेको गम्भीर कुरा हो । (प्रधानमन्त्री, के.पी.शर्मा ओली, गोरखापत्र दैनिक २५ वैशाख २०७५) । खुलेआम देश टुत्र्mयाउने अभिव्यक्ति दिने मात्र होइन विदेशी प्रधानमन्त्री समक्ष सम्विधान विरुद्ध तावेदारी गर्ने प्रदेशका मुख्यमन्त्रीलाई समेत कुनै कारबाही नहुँदा यस्तै अराजकताले अरु प्रोत्साहन पाइरहेका छन् । भाषा, धर्म, संस्कृति, परम्परा र भौगोलिक विचलन तथा ससासाना एकाइगत पहिचानको विवादले नेपाली एकताको सूत्र र समग्र राष्ट्रिय पहिचान मेटिने आशङ.्का बढिरहेको छ । यस पृष्ठभूमिमा पृथ्वीनारायण शाहजस्ता दूरदृष्टि भएका महानायकको योगदान संझन हुनु स्वभाविक हो ।
नेपालको प्राचीन र मध्यकालीन इतिहासको शुद्धिरकरण हुन नसक्नु नै यसो हुनुको प्रमुख कारण देखिन्छ । युद्धमा हार्नुलाई र कसैको इज्जत जाने कामलाई पुर्खाले तुक्काका रूपमा नाक काटिनु भन्दै आएका हुन् । त्यस अर्थमा युद्ध हार्नुबाट तत्कालीन कीर्तीपुरे शासकको नाक काटिनुको अर्थ अस्वभावि थिएन । यो कुनै जातिदमन र जातिको हारजीतको कुरा नभएर त्यहाँका शासकको हारजीतको कुरा थियो । तर त्यही तुक्कालाई ऐतिहासिक तथ्य मान्ने डलरजीवीहरू यस्तै तथ्यहीन कुरालाई लिएर आज जातीय विद्वेषको राँको बाल्ने असफल प्रयत्न गरिरहेका छन् ।
विक्रमको उन्नाइसौं शतब्दीको पूवाद्र्धसम्म पनि नेपाल अनेक स–साना राज्यमा विभक्त थियो । विभाजित राज्यका भुरेटाकुरे शासकहरू आ–आप्mनै सीमित स्वार्थमा डुबिरहेका हुन्थे । यसरी विभाजन र स्वार्थपूर्ण संघर्षका कारण टुक्रा टुक्रामा विभाजित नेपाल कमजोर थियो । उता छिमेकमा व्यापारको निहुँमा इष्ट इन्डिया कम्पनीको रूप धारण गरी अङ्ग्रेजहरू भारत पसिसकेका थिए । तिनले विक्रिका बस्तुसँगै बन्दूक र बाइबल भित्र्याएर भारतीय राजारजौटाहरूलाई बेलायती साम्राज्यको छातमुनि ल्याउँदै भौगोकि तथा धमार्मिक साम्राज्यको बिस्तार गरिरहेका थिए । त्यतिबेला भारतको बंगाल र विहारलाई आफ्नो साम्राज्यमा मिलाएर हिमालयको उत्तर पश्चिमी भूमागतर्फ उनीहरू आँखा गाड्दै थिए । अंग्रेजसँगै आएको क्रिश्चियन धर्मको प्रसारले पनि त्यहाँ व्यापकता लिँदै थियो । इतिहासकारहरूका अनुसार नेपालमा पनि मल्ल राजा प्रतापमल्लकै पालादेखि क्रिश्चियन धर्म प्रचारकहरूसक्रिय थिए । यी यथार्थ पृथ्वीनारायण शाहबाट लुकेको थिएन । नेपाललाई “यो फूलबारीका ठूलासाना चारै जात छत्तीसै वर्णले असली हिन्दुस्थाना“ ठान्ने पृथ्वीनारायण शाहले शक्तिहीन विभाजित नेपालका भूभागलाई अंग्रेजले सहजै आफ्ने कब्जामा लिएर भारतमा फैलिँदै गएको इशाई धर्मको प्रसार तीब्र हुनसक्ने आशंका गर्नु स्वभाविक थियो । त्यसैले नेपालभित्र धर्म प्रचारमा सक्रिय रहेका नयाँ पुराना इशाईहरूलाई प्रोत्साहन दिएमा यो समस्या अरु बढ्ने निश्चित थियो । त्यसैले उनले उपत्यका विजय गरेपछि तिनलाई देशबाट निकाल्नु अस्वभाविक थिएन । विदेशी इतिहासकारहरूले यही कुरालाई लिएर पृथ्वीनारायण शाहलाई बदनाम गर्ने छिद्र खोज्नु पनि स्वभाविक थियो । उनीहरूबाट त्यही काम भयो । हामीले तिनैलाई ब्रह्मवाक्य मानिदियौं । गोरो छलाले भनेको सबै कुरालाई अकाट्य ठान्ने हाम्रो मनसिकताले तिनका गल्पहरूलाई पनि इतिहास ठान्यौं ।
यो भूभागलाई भारत र दक्षिण एसियाभर बढ्दै गएको अंग्रेजी साम्राज्यवादको बिस्तार र फैलँदो इशाईकरणबाट जोगाउन दरिलो सैनिक संगठन निर्माण गरी टुक्राटुक्रमा विभक्त सबै छिमेकी राज्य रजौटाहरूलाई एउटै मालामा नउनेका भए आज विशाल नेपाल देख्न सम्भव थिएन । उक्त कार्यमा बलिया र त्यतिबेलाका धनी राज्यहरूमध्येका अरु कुनैले पनि नेतृत्व लिन सक्थे । काठमाडौं ललितपुर र भक्तपुरका मल्ल रजाहरूले लिनसक्थे, कीर्तपुरले लिनसक्थ्यो त्यो नेतृत्व । तर ती कुनै राज्यले त्यही अवस्थामा शक्ति विभाजित भइरहँदा भविष्यमा आफू पनि अंग्रेज साम्राज्यको बूटमुनि दबिनुबाट उम्किन सकिँदैन भन्ने सोच्न सकेनन् । न त त्यसो गर्न आवश्यक शक्तिसञ्चय नै गर्न सके । नेपालको तराई भागको वन्यसम्पदा, मध्य भागको उनीहरूको देश अनुकुल हावापानी र तिब्बतसँग आफैं स्वतन्त्र किसिमले व्यापार गर्ने चाहनाका कारण पनि तिब्बतसँगको निकट व्यापार नाका आदिक कारण उनीहरू आँखा नेपालमाथि पनि गडिएको थियो । अबस्थामा प्राचीन नेपालको अस्तित्व काय रहन सक्दैनथ्यो । भविष्यको यो संभावना त्यतिबेलका अरु राजा र राज्यले देखेर सैनिक संगठन सुदृढ गराउने र अंग्रेजसँग आँखा जुधाउने साहस देखाउन सकेको भए नेपाल राज्यको एकीकरणको जस पनि गोर्खा र खस राजालाई नभएर उनीहरूलाई नै जान्थ्यो होला । तर त्यो साहस उनीहरूले गर्न सकेनन् । त्यतिबेलाको उनीहरूभन्दा कान्छो र आर्थिक तथा सैनिक संगठनमा समेत कमजोर राज्य गोरखाले त्यो साहस देखायो । त्यसैले यो सत्यलाई लुकाएर नेपाल राज्यको एकीकरणलाई साम्राज्यवादी सैनिक विजयका रूपमा हेरिनु विवेक सम्मत हुँदैन, न त एकोहोरो रूपमा गोरखा राज्य र गोरखाली खस राजाको खोइरो खन्नुको औचित्य देखिन्छ ।
पृथ्वीनारायण शाहको विजय अभियानले नेपाललाई छिमेकी राज्य भारतमा विशाल सेना र शक्तिसहितको इष्टइन्डिया कम्पनीले चलाईरहेकोे उपनिवेशीकरण अभियानको शिकार हुनुबाट जोगायो । वर्तमान नेपालको तत्कालीन पूर्वाधार जातीय राज्यरजौटाहरू भएकाले पृथ्वीनारायणको नायकत्वमा सम्पन्न भएको भए पनि एकीकरणको ऐतिहासिक महायज्ञका सहयोगी विभिन्न जातजाति थिए । पृथ्वीनारायण शाले पनि त्यो तथ्य बुझेर नै “म नै राज्य हुँ, यो राष्ट्रको एकमात्र निर्माता म नै हुँ” भनेनन् । उनले “मेरा साना दुःखले आज्र्याको मुलुक होइन, सबै जातको फूलबारी हो, सबैलाई चेतना भया” भनेर प्रष्ट भने ।
यी सबै तथ्यलाई बेवास्त गर्दै आजका स्वार्थमुखी केही प्रवृत्तिहरू पृथ्वी नारायणको नेपाल एकीकरण अभियानलाई एउटा अतिक्रमणकारी सामन्त राजाको अन्य जातिमाथिको आक्रमण भन्ने संज्ञा दिने गर्छन् । तर यथार्थमा त्यो नेपाल एकीकरणको प्रथम चरण थियो । उनी आक्रमणकारी मात्र भएका भए विजयप्राप्त देशको परम्परादेखि चलिआएको संस्कृतिलाई दमन गर्थे । उल्टो विदेशी नाचगान हेर्नुभन्दा अरु राज्यले पनि तीन शहर नेपाल (काठमाडौं, पाटन, भक्तपुर) का नाचगान झिकाएर हेर्नू भन्दै राष्ट्रिय संस्कृति निर्माणको जग बसाल्दैनथे । प्राचीन संस्कृतिको भण्डार काठमाडौं उपत्यकाको विजय प्राप्तिपश्चात उनले त्यहाँको धार्मिक–सांस्कृतिक क्रियाकलापमा आर्थिक सहयोग गरे । गोर्खाली वा खस संस्कृति लाद्न चाहेका भए उनीबाट यस्तो व्यवहार हुँदैनथ्यो ।
पछि मुख्तियार बहादुर शाहको नेतृत्वमा दोस्रो चरणको एकीकरण अभियानमा पछि सुगौली सन्धीले गुमाएको किल्ला काँगडसम्मको भूभाग नेपालमा मिलाए विशाल नेपालको निर्माण भयो यी दुवै चरणका एकीकरण अभियानमा यहाँका प्रत्येक जातिले आ–आफ्नो क्षेत्रबाट आफ्नै किसिमको योगदान गरेका हुन् ।
पृथ्वीनारायण शाह सुदूर भविष्यसम्म देख्न सक्ने सचेत नेपालली शासक मात्र नभएर नेपालले जन्माएका अत्यन्त बहादुर, राष्ट्रवादी, भाषा–संस्कृति प्रेमी कुशल प्रशासक एवं दूरदर्शी राजा थिए । त्यस बेलाको विकट परिस्थितिमा नेपालको एकीकरण गर्ने सोचका साथै त्यसलाई यथार्यमा परिणत गर्ने कटिबद्धता कम दूरदर्शी र साहसपूर्ण कदम थिएन । सिंगो जीवन एकीकरणको सद्कार्यमा लगाएर खासै सत्ता ससुख लिन नपाए पनि थोरै सयमैं उनले इतिहामै पहिलो पटक नेपाली राष्ट्रवादको आर्थिक, सांस्कृतिक, भाषिक, भूव्यव्यवस्थापन लगायतका विभिन्न नीति–प्रवर्धन गरे ।
वाह्य सम्पर्क र अंग्रेजी साम्राज्य बिस्तारको प्रभावस्वरूप नेपालीहरूके धर्म, भाषा र संस्कृतिका अन्य पक्षमा पर्नसक्ने असर आकलन गरे । त्यसको नियन्त्रणका लागि आत्मनिर्भर स्वदेशी आर्थिक तथा नेपाली मौलिकतामा आधारित राष्ट्रिय सांस्कृतिक नीतिको खाका कोरे । वाह्यधर्मको प्रभाव नियन्त्रण गरी धार्मिक सुदृढताको पक्षमा स्पष्ट नीति लागू गरे । शिक्षाको सुदृढीकरणका साथै आत्मनिर्भर स्वदेशी उद्योगको संरक्षणका लागि स्पष्ट नीति तर्जुमा गरे । उनले दिव्य उपदेशमा भनेका छन्– “विदेशी कपडा लाउन मनाही गरिदिनू । आफ्नो देशको कपडा बुन्न जान्नेलाई नमूना देखाइ सघाउनू र बुन्न लगाउनू । यसो भए नगद विदेश जाँदैन । विदेशका महाजन हाम्रो मुलुकमा आए भने दुनियाँलाई कंगाल गराउँछन् । आफ्नो देशका जिनिस र जरीबूटी विदेश पठाई नगद् खिच्नू । खानी भएका ठाउँमा गाउँ भए पनि अन्यत्र सारीकन पनि खानी चलाउनू । गह्रो बन्ने जग्गामा घर भए पनि घर अरु ठाउँमा सारी कुलो काटी खेत बनाई आवाद गर्नु ।” त्यतिबेलाको समयमा यो उद्योग नीति कम बुद्धिमानीपूर्ण थिएन । उनी पछिको नेपालले समेत अंगीकार गर्दै जानु पर्ने यी मार्गदर्शन पछिल्लो नेपालले बिर्सँदै गयो । त्यस विपरीतको् गलत नीति अवलम्वन गरिँदै गयो । यसकै फलस्वरूप मुलुक आज विदेशी उत्पादनको डम्पिङ साइट बन्दैछ । व्यापारघाटा देशले धान्न नसक्ने गरी बढिरहेको छ ।
“बूढ मरे, भाषा सरे” भन्ने पृथ्वीनारायण शाहको उपदेश बिर्सेर हामी आफ्ना सन्तानलाई मातृभाषाबाट अलग्याएर कमाउ अंग्रेजीभाषा मोहको भोक जगाउँदै छौं । राष्ट्रिय भाषालाई अन्य कुनै विदेशी भाषा सरहनै मात्र अभिव्यक्तिको सामान्य माध्यम मानेर पराइभन्दा पनि कम मान्यता दिने प्रवृत्ति हामीमा निकै बढ्न थालेको छ । भूमण्डलीय विश्वसभ्यताको प्रतीक बन्दै गएको अङ््गे्रजी भाषा र पश्चिमा संस्कार–संस्कृति तथा डलर मोहनीले व्यामोहित आजका हामी प्राय सबै नै राष्ट्रिय भाषा र संस्कृतिलाई त्यति महत्व दिन तयार छैनौं । यो अवस्थाबाट वर्तमान नेपालले छुट्कारा पाउने उपायस्वरूप अघिसारेको मातृ भाषामा शिक्षाको अवधारणा पनि अंग्रेजी मोहका कारण राजनीतिक नारामा मात्र सीमित भइरहेको छ । यसलाई सफल तुल्याउने अन्तरदेखिको प्रतिबद्धता सर्वप्रथम मातृभाषी समुदायमैं विकसित हुनु जरुरी पर्छ । तर आज कमाउ भाषा अङ्ग्रेजी विग्रने डरले शिशुहरू आमाको काखदेखि नै घरेलू वातावरणमा समेत मातृ भाषा सुन्न र बोल्नबाट वञ्चित हुँदैछन् । त्यसैले आज छिमेकका र विश्वका शक्तिशाली भाषा तथा तिनका प्रसारक सञ्चार सञ्जालका कारण कुनै पनि साना राष्ट्र र जातिका भाषा सुरक्षित छैनन ।
भाषामात्र नभएर समग्र नेपाली संस्कृति समेत तीब्र अतिक्रमणको चपेटामा पर्दो छ । विदेशी नाचगान, चालचलन र संस्कृतिको मोहमा स्वसंस्कृति बिस्तारै बिर्सँदै जाने क्रम बढ्दो छ । पृथ्वीनारायण शाहले त्यतिबेलै राष्ट्रिय संस्कृतिमाथि पर्ने चाप र दवावलाई अनुभव गरेर “आफ्ना सोषसयललाई ता शास्त्र बमोजिम तिनै शहर नेपालको नेवारहरुको नाच झिकाई हे¥या पनि हुन्छ । यिनमा दिया पनि आफ्नै देशमा रहन्छ” भनेर बाह्य संस्कृतिको आक्रमणबाट जोगिन सतर्क गराइसकेका हुन् । यही कुरालाई आत्मसात गर्न नसक्दा आज नेपाली संस्कृति कसरी अरुको सेपमा टाक्सिँदै गएको छ र यसकै परिणाम कतिपय जातिका भाषा नाचगान र गीत–संगीत लोपोन्मुख अवस्थामा पुग्दैछन भन्ने उदाहरण देखिंदै छ । पृथ्वीनारायण शाहले त्यतिबेलै दिएका चेतावनीलाई बेवास्ता गर्दाको परिणाम बाटै आजको यो अवस्था आएको अनुमान गर्न कठिन पर्दैन । यो स्थितिलाई न विभाजित भाषा र संस्कृतिको राजनीतिले सपार्न सक्छ, न एक आपसमा विभाजित भएर झगडा गर्दै बाहिरकालाई आफ्नो घर कब्जा गर्न दिने खाले प्रवृत्तिले सुधार आउन सक्छ । पृथ्वीनारायण शाहले भनेका थिए “सुखसयलका लागि तीन सहर नेपालबाट झिकाएर नेपालको नाच हेरे पनि हुन्छ । यसो भए दिएको पैसा आफ्नै देशमा रहन्छ ।” यो कुरा मनन गर्न सकेको भए आज यस्तो अवस्था सायद् आउँदैनथ्यो ।
आज हाम्रोजस्तो विकासका दृष्टिले पछिडिएका राष्ट्रले सांस्कृतिक दृष्टिमा दोहोरो चुनौती बेहार्नु परिरहेको छ । पहिलो, सामन्ती संस्कृतिका संवाहक जनविरोधी संस्कृतिलाई जनसंस्कृतिमा रूपान्तरण गर्ने चुनौती । दोस्रो, सोभियत सङ्घको विघटनसँगै विश्व बैंक र अन्तर्राष्टिय मुद्राकोषलाई अघि सारेर युरापीय युनियन र अमेरिकी नेतृत्वले अघि बढाएको खुला बजार अर्थव्यवस्था तथा भूमण्डलीकरण प्रक्रियासँगै विकसित भएको उपभोक्तावादको छद्म भेषमा प्रसारित साम्राज्यवादी लौकिक संस्कृतिको दुष्प्रभावबाट सिर्जित बाह्यसंस्कृतिको आक्रमणबाटजोगिने चुनौती ।
नेपाली समाजमा सहरी जनसंख्याको सम्पन्न र नवधनिक वर्गको एउटा हिस्सा आधुनिकताका नाउँमा बाहिरी संस्कृतिको अन्धाधुन्द अनुकरण गरिरहेको छ । यही समाजको अर्को सर्वाधिक ठूलो हिस्सा आर्थिक सामाजिक शोषणको हतियारका रूपमा विकसित गलत संस्कार र व्यवहारलाई नै वास्तविक संस्कृति ठानेर अझै शोषण–उत्पीडनको जीवन भोगिरहेको छ । यसरी एकथरी आप्mनो मूल्यमा आधारित सांस्कृतिक पक्षहरुलाई लहैलहैमा त्याग्दै स्वच्छन्दता र नियन्त्रणहीन उन्मुुक्ततालाई आधुनिक सभ्यताको पहिचान ठान्ने गल्ती गरिरहेका छन् । अर्काथरी राष्ट्रिय र जातीय संस्कृतिका नाउँमा सामन्ती सत्ता टिकाउन हतियारका रूपमा प्रयोग गरिँदै आएको आर्थिक–सामाजिक शोषण र विभेदको पर्खाल खडा गर्न सघाउने विभिन्न रीतरिवाज र धर्मपरम्पराहरूबाट अझै शोषण तथा अन्धविश्वासबाट मुक्त हुनसकिरहेका छैनन् । यसरी एकातिर हाम्रो राष्ट्रिय–जातीय संस्कृतिलाई हलिउड र बलिउडकासाथै बहुराष्ट्रिय निगमद्वारा उत्पादित–प्रवद्र्धित बाह्य संस्कृतिद्वारा विस्थापित हुने खतरामा पुगिरहेका छ, अर्कातिर बोक्सी र छूवाछूतजस्ता सभ्यताकै अभिशापहरुबाट नेपाली समाज मुक्त हुन सकिरहेको छैन । यसरी नेपाली संस्कृतिमा घुसेका गलत व्यवहारको परिमार्जन हुननसक्नु र बाह्य सांस्कृतिक अतिक्रमणको अन्धानुसरणमा होमिनुको दोहोरो चापमा नेपाली सभ्यता र संस्कृति अहिले नराम्ररी चेपिएको अनुभव हुन्छ ।
पृथ्वीनारायण शाहले देशकोे आन्तरिक नीति र शासनव्यस्थामा मात्र होइन, मुलुकको भौगोलिक अवस्थालाई समेत ख्यालमा राखेर नेपालको परराष्ट्र नीति सम्बन्धी अत्यन्त व्यवहारिक तथा दीर्घकालीन नीतिको तर्जुमा गरेर गएका छन् । “यो राजे दुई ढुङ्गाको तरुल जस्तो रहेछ” भन्ने उनको निष्कर्ष भारत र चीनजस्ता दुई प्रतिष्पर्धी विशाल मुलुकका बीच च्याप्पिएर रहेको नेपालले कसरी दुबैलाई समान र सन्तुलित व्यवहार गरी आफूलाई सुरक्षित र गतिशील बनाउनुपर्छ भन्ने कूटनीतिक सत्यअनुरुपको थियो । आज झण्डै अढाई शताब्दी पछिको विश्वग्रामको अवधारणयुक्त आजको एकध्रुवीय विश्वमा समेत यो सन्तुलनको सूत्र उत्तिकै व्यवहारिक र भौगोलिक यथार्थ अनुकूल छ । बेलाबखत यो मूल कूटनीतिक तथा नेपालको आधारभूत विदेश नीतिमा विचलन आउँदा एकतर्फ वा पक्षविशेषसँग लहस्सिने कमजोरी देखा¥यो । यसबाट मुलुकले समस्या पनि बहोर्नु परेका उदाहरण प्रशस्त छन् । राष्ट्रिय विभूति बडामहाराजाधिराज पृथ्वी नारायण शाहकोे कुशल नेतृत्वमा आधुनिक नेपाल अधिराज्यको निर्माण र एकीकरण भएको दुई सय तेत्तीस वर्ष पूरा भएको छ । पृथ्वी नारायण शाहको नेतृत्वमा नेपालको भौगोेलिक–राजनीतिक एकीकरण र एकता तथा सैन्यकरण मात्र होइन, हाम्रो सार्वभौमिकता र अक्षुण्णताका साथै मुलुकको रानीतिक,आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रहरुमा सर्वतोमुखी विकासलाई समेत सन्तुलित रुपमा अघि बढाउने प्रयत्न भएको पाइन्छ । जीवनको प्राय सबै समय नेपाल एकीकरणको अभियान अन्तर्गत युद्धभूमिमैं विताएका पृथ्वी नारायण शाह लडाकु मनसिकताका सैनिक मात्र थिएनन्, दूरदर्शी शासक, जनताप्रेमी नेताका साथै सुशासनका प्रवल पक्षधरताका गुणहरु पनि थिए भन्ने प्रमाणका रुपमा उनको दिव्योपदेश हाम्रो अगाडि छँदै छ ।
दुनियाँ जसदेखि राजी रहन्छ त्यसैलाई कजाइँ दिनू ,प्रजा मोटा भया दरबार बलियो हुन्छ जस्ता प्रजातान्त्रिक धारणालाई त्यतिबेलै पृथ्वी नारायण शाहले आफूले मनराएका विराज बखेतीको साटो जनताले रुचाएका कालु पाण्डेलाई अधिकार दिएर व्यवहारिक प्रयोगमा ल्याएका हुन् । बीसे नगर्चीजस्ता सामान्यजनसँग सरसल्लाह गरेर मात्र उनले एकीकरण अभियान अघि बढाएका हुन् । आजको प्रजातान्त्रिक प्रणालीमा बरु जनताका दृष्टिमा गनाएका व्यक्तिहरुलाई शासनसंंयन्त्रमा पदासिन गराइनु सामान्यजस्तै देन्छि । जनताको हित र भलाइमा भन्दा सत्तामा टिकीरहनका लागि आफू र आफ्नालाई मुलुक लुट्न दिने होडबाजीको प्रबृत्तिले प्रोत्साहन पाइरहेको छ । प्रजातन्त्रको मन्त्र जप्नेहरू नै प्रजातान्त्रिक मूल्यमाथि प्रहार गरिरहेकाछन् ।
बडामहाराजाका यी उपदेशहरु उनी पछिकाले पनि त्यति मनन गर्न सकेनन् । पछिल्लो कालखण्डमा त विदेशी शक्तिसाली शासकलाई रिझाएर सत्ता जोगाउने प्रबृत्ति बढ्दै गयो । जनता मोटा पार्नुको साटो उनीहरुलाई शोषण गरेर व्यक्तिको भण्डार भर्ने प्रबृत्तिको होडबाजी सुरुभयो । उनीहरुको विलाशितापूर्ण जीवन शैलीले बाह्य संस्कृतिको प्रसारलाई मदत पु¥यायो । त्यसको छाप र प्रभावलाई पञ्चायती कालखण्डमा त के कुरा २०४६ सालको जनआन्दोलनले पुनःस्थापित गरेको वर्तमान राजनीतिक प्रणाली र यसका सञ्चालकहरुले समेत पन्छाएर फाल्न सकेनन् । पछिल्लो कालखण्डमा त झन जातीय विद्वेष, भाषिक किचलो र धार्मिक–सांस्कृतिक–भााषिक अतिक्रमणका गुमस्ताहरूकै बोलबाल रह्यो । युरोपियन युनियन र पश्चिमा धार्मिक मिसनरी संघसंस्थाहरू एनजिओ–आइएजिओका नाउँमा डलरको बिटो बोक्दै ओइरिए । तिनलाई काँध थाप्ने डलरका भोका केही बुद्धिजीवी र अनेक नामधारी कर्मीहरूको जमानत खडा भयो । पृथ्वी नारायण शाहले उपत्यका पस्न नदिएका क्रिश्चियन धर्मप्रचारकहरूको प्रतिशोधस्वरूप तयार गरिएका कतिपय किम्वदन्तीलाई नै इतिहासको प्रामाणिकता ठानेर २२ किलो नाकका कथा गढिए । हामीले तिनै कुरालाई पत्यार गर्दै आयौं । काटिएको नाकको टुप्पो २२ किलो पुग्न कति जनताको नाक काटिनु पर्ला र त्यतिबेलाको कीर्तिपुरको जनसङ्ख्या कति थियो होला भन्ने हामीले कहिल्यै सोचेनौं ।
यसकै प्रतिफल बडामहाराजाधिराजका “अन्याय मुलुकमा हुननदिनू, न्याशास्त्र बमोजिम अदालत चलाउनू, अदालतको पैसा दरबारभित्र नहाल्नू, नियाँ निसाफ बिगार्ने भनेका घुस दिने र घुस खाने हुन् । यी दुइको त धन, जिउ (सर्वस्व) गरिदिए पनि पाप छैन, यी राजा र प्रजाका महशत्रु हुन्” भन्ने जस्ता आदर्श निर्देशनहरुप्रति बेवास्ता हुँदै गयो । उल्टो यस्ता आदर्श विरुद्ध वातावरण बन्दै गयो । तीस वर्षसम्म आदर्श र मूल्यका लागि ज्यान हत्केलामा राखेर लड्दै आएका अधिकांश नेता र दलहरू पूर्व आदर्शबाट स्खलित हुँदै बरु त्यसैमा बग्दै गए । तिनले आफैलाइै अवमूल्यनको सङ्घारमा पु¥याए, र आज मुलुक यो हालतमा पुगेको छ । भ्रष्टाचारमुक्त सुशासन, जनतानै राष्ट्रको वास्तविक शक्ति हो भन्ने कुरा, जनताको निर्णयलाई आफ्नो चाहनाभन्दा माथि राख्नुपर्छ भन्ने जस्ता कुरालाई आज पनि महत्व दिइएको भए सायद नेपालले आजको जटिल परिस्थिति भोग्नुपर्ने थिएन ।
पृथ्वीनारायण शाहका यी उपदेशहरुले सवा दुईसय वर्षको कालावधि पार गरिसक्दा पनि उनले लिएका आर्थिक, सामाजिक, वैदेशिक तथा सांस्कृतिक नीतिहरु मध्ये अधिकांश आज पनि हाम्रालागि त्यत्तिकै महत्वपूर्ण र उपयोगी छन् । प्रादेशिक वा भौगोलिक सीमाबिस्तारको दृष्टिले मात्र नभएर एउटा न्यायपूर्ण लोककल्याणकारी शासनव्यवस्था तथा उन्नतशील राष्ट्रको निर्माणका प्रवर्तकका रुपमा समेत पृथ्वनारायण शाहको स्थान सुरक्षित रहेको छ भन्नु बढी नठहर्ला । कुनै पनि मुलुकको उन्नति त्यहाँको न्याययुक्त स्वतन्त्र वातावरणको निर्माण, दाउपेचभन्दा योग्यता प्रदर्शन गरेर आफ्नो उन्नति गर्नेे दिशामा प्रतिस्पद्र्धाको सम्मान, योग्यताको कदर, तथा देश र जनता प्रतिको उच्चसमर्पणभावजस्ता कुराहरुको विकासमा निर्भर गर्दछ । उहिले नै पृथ्वीनारायण शाहले अनुभव गरेका यस्ता कुरामा आजको प्रजातान्त्रिक नेपाल समेत सचेत हुननसक्दाको पीडा मुलुकले विभिन्न समस्याका रुपमा बेहोरिरहेको सत्यलाई अस्वीकार गर्नसकिने ठाउँ देखिंदैन ।
विजय निवास, आरुबारी ।

Monday, August 20, 2018

कसरी व्यक्त गरौं म त्यो असहनीय पीडा ! विजय चालिसे


(सुलेख–७१, साउन २०७५ मा प्रकाशित)
अन्ततः पचास वर्षको साथ छाडिन लक्ष्मीले ! २०७४ सालको चैत २८ विहानै छ बजे अस्तालबाट सन्देश आयो– आमाले तपाइलाई खोजिरहनु भएको छ । जतिसक्यो चाँडो आउनोस् ।
आफ्नै स्वास्थ्यको कारण धेरै समयदेखि मोटरसाइकल चलाउन छाडिसकेकोले आफ्नो अर्के साधन छैन । अस्पता ल लाने ल्याउने काममा पुत्रसमान गोविन्द अधिकरीले सघाइरहेक छन् । अघिपछि पनि बिरामीलाई अस्पताल लाने ल्याउन गाडी आवश्यक पर्दा सघाउँदै आएका छिमेकी भतिज निर्मललाई बोलाएर भक्तपुर अस्पताल पुग्दा पौने आठ बजिहाल्यो । लक्ष्मी छट्पटाइरहेकी थिइन । एकोहोरो घ्वार घ्वारको आवाजले भित्रैदेखिको पीडा व्यक्त भइरहेको थियो । अक्सिजन, सलाइन आदिमा जेलिएको शिथील शरीरमा घ्वार घ्वारको गतिसँगै  छात्ती आरनको खलाती झैं मुटु नै बाहिर निस्केला जसरी तलमाथि गरिरहेको देखिन्थ्यो । बोली चार बजेदेखि नै बसिसकेको रहेछ । आँखा टम्म थियो –मानौं उनलाई अब यो संसार हेर्नु छैन, कसैलाई देख्नु छैन । चिकित्सकको टोली प्रयत्नरत रहे पनि तिनको अनुहारमा निराशा प्रष्ट देखिँदै थियो ।
रात बाह्र बजेदेखि नै मलाई खोजेकी रहिछन् । अघिल्लो दिन अस्पतालबाटै साँझ सात आठ बजे घरफर्केको र अलि विसञ्चो पनि भएकोले आधा रातमा बोलाउनु उचित ठानेनछन् अस्पतालमा कुर्न बसेका सहृदयी सहयोगी बन्धुद्वय गोविन्द र भवानीले । म पुग्दा लक्ष्मी बोल्न सक्ने अवस्थामा थिइनन् । प्याक प्याक भइरहेको मुखमा मात्र दुई चम्चा पानी ख्वाउन पाएँ मैले अन्त्यमा । केही भन्न खोजेकी थिइन् होला, त्यो अवसर समेत पाउन सकिन । आठ पचन्नमा त पञ्चतत्वमा विलीन हुन लामो साथ छाडेर महाप्रस्थमा गइहालिन् । साधारण रुघाबाट शुरु भएको क्यान्सर रूपी दानवको एघार महिना लामो यन्त्रणापूर्ण सङ्घर्षमा आखिर पराजित भइन उनी । मेरो सारा संसार अन्धकारमय भयो, जीवनमा अब साँच्चिकै एक्लो अनुभव गरेँ मैले, नितान्त एक्लो  ! त्यस घडी मभित्रको प्रलय कसरी वर्णन गर्ने, उपयुक्त शब्द समेत छैन मसँग !
पाँच दिनको नेपाल मेडिकल कलेज बसाइपछि जेठ २४ गते लक्ष्मीलाई लिएर उपचारार्थ नयाँदिल्ली पुगेको थिएँ म । शुरुमा समस्या ठूलो थिएन, सामान्य रुघाखेकीले दुःख दिएको थियो । रुघाखोकीबाट सुरु भएको सानो समस्या क्यान्सरजस्तो घातक रोगको कारण होला भन्ने के थाहा ? त्यसैले केही दिन घरेलु उपचारमा खर्चनु स्वाभाविक थियो । त्यो घरेलु उपचारले बीसको उन्नाइस पनि नभएपछि पछि अस्पताल धाउने क्रम सुरु भयो । केही समय यो हो कि, त्यो हो को चिकित्सकीय अनुमानमैं समय चिप्लियो । एक्सरेले फोक्सोमा देखाएको दागको निक्र्योल गर्न गरिएको सिटिस्क्यानले पनि यसै हो नभने पछि चिकित्सकको सल्लाहमा नमूना परीक्षण (बायोप्सी) का लागि अर्को पाँच दिन अस्पतालको शैय्यामैं बितिहाल्यो । सीटीस्क्यान गर्दा फोक्सोको वायाँपटि तल्लो खण्डको माथिल्लो भागमा विभाजक नलीलाई समेत च्यापेर बढ्दै गएको सानो मासुको डल्लो देखियो । अरु निश्चि हुन चिकित्सक टोलीका प्रमुख कन्सल्ट्यान्ट डा. के. सी. (कृष्णचन्द्र) देवकोटाले ब्रोन्कुल बायोप्सी गरेर हेर्नु पर्ने सुझाउ दिए, नाइँ भन्ने कुरै भएन ।
उनी बायोप्सीको लागि नमूना (स्याम्पल) निकाल्ने अभियानमा जुटे । म हेर्न चाहन्नथेँ, आफ्नी अति प्रियपत्नीको मुखबाट मोटो नली पसाएर फोक्सोसम्म पु¥याउँदै मासु निकालेको हेर्ने शहस नै जुटाउन सकेको थिइन मैले । तर डाक्टर देवकोटाले नडराउनोस्, म तपाइँलाई सबै देखाउँछु भनेपछि उनकै साथ उभिएर हेरेँ, त्यो प्रक्रिया । डाक्टरले त्यो डल्लोसम्म यन्त्र पु¥याएर नमुना लिन निकै कोसिस गरे । लामो प्रयासपछि बल्ल सफलता मिल्यो सायद । ह्याम्समा नमूना परीक्षणको लागि पठाइएको रिपोर्टका लिन अर्को एक हप्ता लागे पनि रिपोर्ट “निगेटिभ फर मेलिग्नेन्ट सेल” भन्ने आएपछि ढुक्क भएँ । शङ्का गरेजस्तो अर्बूद होइन भन्ने त्यो रिपेर्टको एक एक अक्षर मेरो लागि जीवनदायी शब्द थिए । रातभर आफन्तसग खुशी बाँडेँ मैले ।
त्यो खुशी भनने धेरै लामो समयसम्म टिकेन । भोलिपल्टै डाक्टरलाई रिपोर्ट देखाए पछि डाक्टरले मलाई बिरामी कक्ष (वार्ड) बाहिर बोलाए ।
“धेरै खुशी भइनहाल्नोस्, विजयजी ! रिपोर्टमा निगेटिभ अर्थात मेलिग्नेन्ट सेल होइन भने पनि त्यसमा केही पक्कै छ । मेरो अनुमानमा त्यो मेलिग्नेन्ट क्यान्सर नै हुनुपर्छ । त्यो डल्लो (लम्प) निकै असजिलो ठाउँमा छ, बडो मुस्किलसँग त्यसको नजिक पुग्न सकेको देखिहाल्नुभयो । त्यहिँसम्म उपकरण पठाएर नमूना निकाल्न सकेँ कि सकिन भन्ने कुरामा म आफैं निश्चित छैन । त्यसको लागि चाहिने उपकरण नेपालमा अन्त पनि छैन । सोझै अपरेसन गरेर फालौं भने पनि त्यसले माथिल्लो खण्ड छुट्याउने नलीलाई माथि धकेलिरहेकोले सम्भव छैन । पूरै आधा फोक्सो काटेर फाल्दा शरीरले धान्छ धान्दैन भन्न सकिन्न । त्यसैले विदेशतिर लानु भए राम्रो हुन्छ ।”
क्यान्सर.....! उफ सुन्दा पनि कति पीडादायक । समाजमा क्यान्सरलाई असाध्य र मृत्युको पयार्य मानिँदै आएकोले होला, डाक्टरको कुरा सुन्नासाथ मभित्र एउटा नजानिँदो भयको आतङ्क फैलिएको थियो । चारैतिर अँध्यारो फैलियो, ठूलो पहिरो गयो मभित्र । लगभग पचास वर्ष एकअर्काको छाया बन्दै सबै कुरामा मलाई उन्मुक्त र स्वतन्त्र छाडेर उनले मेरो आजको व्यक्तित्व निर्माणमा सर्वाधिक योगदान गरिन । यसरी आफ्नो अस्तित्वको आधा अंश जीवनसङ्गीनीसँगको विछोडको कल्पना मात्रै पनि मेरोलागि असह्य पीडादायी कल्पना थियो । त्यसैले डाक्टरबाट घातक रोगको आशङ्का सुन्नासाथ डाँको छाडेर रुन चाहन्थेँ म । मेरो पौरूषको झुठो अहंले मलाई त्यसरी डाँको छाडेर रुनबाट पनि रोकिरहेको थियो । अत्यन्त निरिह थिएँ म त्यो क्षण ।
मैले क्यान्सरको क्रूर आक्रमण कति पीडादायक हुन्छ भन्ने नजिकबाट देखिसकेको थिएँ । साथै समयमैं सही उपचार हुन सकेमा यसलाई परास्त गर्न सकिन्छ भन्ने पनि त्यही अनुभवले सिकाएको थियो । यतिखेर श्रीमतीलाई फोक्सोको क्यान्सर हुनसक्ने आशङ्कासँगै ३७ वर्ष अघि स्तनक्यान्सर र त्यसको उपचारमा दिइएको केमोको असरबाट छटपटाइरहनु हुने आमाको अनुहार घरी घरी आँखा अगाडि ठोक्किन आइरहेको थियो । हो त, त्यतिबेला पीडाले छटपटाइरहनु भएकी आमालाई देखेर हामी आफैं छट्पटाउँथ्यौं । आमाको  दायाँ स्तनमा यही दुष्ट क्यान्सरले घातक आक्रमण गरेको थियो । यिनै लक्ष्मीले समयमैं क्यान्सरको त्यो गिर्खो फेला पारेर वीर अस्पताल पु¥यएकी थिइन । त्यहीँ अपरेसन भयो । त्यतिबेला स्वदेशमा केमोको सुविधा नभएकोले बनारस लाग्नु परेको थियो । अहिलेजस्तो उन्नत औषधि र उपचार विधिको विकास नभइसकेको भए पनि समयमैं पत्ता लागेकोले होला आमा त्यसपछिको अठाह्र वर्ष स्वस्थ्य जीवन व्यतीत गर्न सफल हुनु भयो । उपचार क्रममा हुने पीडालाई त कसले रोक्न सक्थ्यो र ? तर के गर्नु ? यसरी लामो समय पिताजीसहित हामी सबै सन्तानले मानसिक पीडाको रौरवमा पौडन परे पनि चिकित्सक र चिकित्सा विज्ञानको सफलताले डेढ दशकसम्म परास्त झैं शरीरको कुनै कुनोमा लुकेर बसेको त्यही कर्कटले १८ वर्षपछि फेरि शिर उठायो । अर्कोपटिको स्तनमा फेरि आक्रमण ग¥यो । त्यतिबेला हामी अलग्याइसकेका थियौं, बाबाआमा भाइको परिवारसँग बस्नुहुन्थ्यो । फेलापारुन्जेलमा रोगले शरीरका विभिन्न ठाउँमा कब्जा जमाइसके छ । फैलिइसकेको त्यही कर्कटले विजयको कर्कस अट्टहास छाड्यो वि.सं. २०५७ असारमा । आमाको भौतिक देह रहेन ।
त्यसैले मन आर्फैंलाई सम्झाउँदै थियो– अहिले नै निराश बन्नु आवश्यक छैन, आफैंलाई सम्हाल । आशङ्का मात्र न हो । सबै आशङ्का सत्य नै हुन्छ भन्ने पनि त होइन । दिल्ली पुगेर थप परीक्षण गर्दा डाक्टर देवकोटाको यो आशङ्का असत्य ठहरिन पनि त सक्छ । सत्य नै भए पनि आज चिकित्सा विज्ञानले हिजोकोभन्दा धेरै फड्को मारिसकेको छ । त्यसैले नडरा । हो नै भने पनि निको हुन्छ । केही समय दुख पाउने भइन, त्यति नहो !
जति नै सान्त्वना दिए पनि मन आतङ्ति थियो, आशङ्कित थियो । त्यही आशङ्का, तिनै आतङ्ककाबीच उपचारका लागि अस्पतालबाट फर्केको तेस्रो दिन अपराह्न दिल्ली उडियो । आधुनिक सञ्चार प्रणालीको प्रयोग गरी दिल्लीको अपोलो अस्पतालमा घरैबाट विशेषज्ञ डाक्टरसँग समय मिलाइसकिएको थियो । नजिकैको होटेल रामपाल प्यलेस बुक भइसकेको थियो । केही समय अघि मात्रै मित्र तेजप्रकाश श्रेष्ठ त्यही अस्पतलमा प्रोष्टेट अपरेसन गरेर फर्केकाले पनि अस्पताल र होटेल बारे पर्याप्त जानकारी र सूचना प्राप्त हुनसकेको थियो । त्यसले गर्दा दिल्ली भ्रमण र अस्पताल तथा होेटलको व्यवस्थापन सहज हुन पुग्यो । अपोलो अस्पतालको अन्तर्राष्ट्रिय विमार सहयोग कक्ष (इन्टरनेशनल पेसेन्ट लाउन्ज– आइपीएल) सँगको विद्युतीय सञ्चारको आदानप्रदानले सबै कुरा व्यवस्थित गर्दै गयो । आइपिएलले दिएको पूर्व सूचना अनुसार नै विमानस्थलमा उनीहरूले पठाएका प्रतिनिधि हातमा लक्ष्मीको नाम लेखिएको परिचायक चिह्न सहित स्वागत गर्न उपस्थित थिए । भन्सारदेखि अध्यागमनसम्मका सम्पूर्ण प्रक्रियामा तिनै प्रतिनिधको पूर्ण सहयोग रह्यो, हाम्रो काम थियो उनको पछि पछि लाग्नु र उनले भनेजस्तै गर्दै जानु ! विमानस्थलको सबै प्रक्रिया पूरा गरेर बाहिर निस्कँदा होटेल पु¥याउने सवारी साधन तम्तयार थियो । ती सहयोगी प्रतिनिधि सवारी साधनको जिम्मा लाएर विदा भए । होेटेल पुग्दा रातको साढे दश बजिसकेको थियो । आलोक पनि टोकियोबाट चार घण्टापछि होटल आइपुग्यो । 
एक साताको नेपाल मेडिकल कलेज अस्पताल बसाइपछि जेठ २४ गते नयाँदिल्लीस्थित अपोलो अस्पतालमा परीक्षण प्रारम्भ भयो । वाथरोग र अन्य समस्याको पनि सामान्य परीक्षण गरिए पनि भयो । मुख्य उपचार अर्बूदकै थियो । त्यसैले अस्पतालको अन्तर्राष्ट्रिय विमार सहयोग कक्षको परामर्श र व्यवस्थामा अर्बूद रोग विभागका कन्सल्ट्यान्ट विशेषज्ञ (सल्यचिकित्सक) प्रोफेसर डाक्टर विश्वनाथ प्रताप सिंह र डा.रुकैया अहमद मिरको टोलीले उपचार प्रारम्भ ग¥यो । नेपालमा हुन नसकेको पेटस्क्यान, युरिया र क्रेटिनाइनको परीक्षणका अतिरिक्त नेपाल मेडिकल कलेजमा गरिएका एकहप्ताभित्रका सबै परीक्षण रिपोर्ट  मान्य भए । त्यसले गर्दा खर्च र समय दुवैको बचत भयो । हामीकहाँ भए एउटा अस्पतालमा गराएको पक्षरीक्षण अर्कोले नमानेर, भोलिपल्टै भए पनि दोहो¥याउन लगाउँथे । महङ्गा परीक्षणलाई नाफाको पेशा बनाउँछन् हाम्रा अस्पताल ।     
भोलिपल्टै पेटस्क्यान गरिए पनि रिपोर्ट आउन अर्को चार दिन लाग्यो । त्यो रिपोर्ट नआउँदै बायोप्सीको लागि दुई दिनका लागि जेठ २७ गते अस्पताल भर्ना गरियो । बायोप्सीको रिपोर्ट ७२ घन्टा कल्चर गर्नु पर्ने भएकोलेफेरि पर्खनै पथ्र्यो । 
“बायोप्सी रिपोर्ट हेरेपछि अपरेसन गर्नु पर्ने भए दुई दिनभित्र गर्छौं । चारपाँच दिन अस्पतामैं बस्नुपर्ला । डिस्चार्ज भएको एक हप्तामा फलोअपका लागि आउनुपर्छ ।” एक प्रकारले डा. रुकैया उपचार यही अनुसार अगि बढ्नेमा विश्वस्त जस्तै देखिइन् । त्यसो भएमा ढिलै भए पनि असारको आधाआधिमा घर फर्कन पाइने संभावना थियो ।
भी. पी. सिंहसँग सल्लाहनै नगरी रुकैयाले त्यो सोच बनाएकी रहिछन् । डा. सिंहले एकपटक अर्को विशेषज्ञसँग डा. अवधेश वंशलसँग सल्लाह गरेर मात्र उपचार योजना अघि बढाउने निर्णय गरेर डा.वंशलकहाँ पठए । उनले रिपोर्ट र बिरामी हेरे पछि कार्वन स्क्यान हो कि, के भन्ने अर्को एउट विशेष न्युक्लियर गामा एक्सरे गराए । एक्सरे सक्नासाथ अपरेसन गरिहाल्ने निर्णयमा पुग्यो चिकित्सक टोली । त्यही दिन भर्ना गरियो अपरेसनको लगि ।
असार २ गते ठीक २  बजे कोठाबाट अपरेसन कक्षमा थेटरमा लगेको, आधा घन्टापछि नै अपरेसन थालिएको भन्ने खबर पाइए पनि घन्टौं घन्टासम्म थप जानकारी पाइएन । एक एक सेकेन्ड सिंगो युग झैं लाग्दै थियो । ठूलो अपरेसन, अपरेसन टेबलमैं जे पनि हुनसक्थ्यो । के भयो, कसो भयो ? कस्तो हुँदैछ ? भन्ने जिज्ञासाले मसहित छोरा छोरी अञ्जु र आलोक पलपल छटपटाइरह्यौं । आठबजेतिर बल्ल साढे पाँच घन्टापछि अपरेसन सकेर आइसयिुमा लगेको खबर पाइयो । डाक्टरले दिएको जानकारीमा अपरेसनलाई पूरापुर पाँच घन्टा लागेछ । वायाँ तर्फको फोक्सो पूरै काटेर फालिएछ । फालिएको भागको नमूना बायोप्सीको लागि पठाइएको छ । त्यो सुनेर हामीले बल्ल निश्चिन्तताको लामो सास फे¥यौं ।
आठबजे तिर डाक्टरले बोलाएपछि आइसियुमा बल्ल देख्न पाइयो । लक्ष्मीको अवस्था देख्दा भने केही क्षण अगाडिको त्यो निश्चिन्तता र सन्तोषको अनुभूति फेरि  भुइमा बज्रिएको पानीको फोकाझैं चकनाचूर हुन पुग्यो । अत्यन्त पीडा भइरहेको थियो उनलाई । एकातिर कोखा चिरेर आधा फोक्सो निकाल्दाको घाउ र त्यसको दुखाइ, कल्पना गर्दा पनि आङ जिरिङ्ग गथ्र्यो । अर्कोतिर आइसियुको रहस्यमय झैं लाग्ने वातावरण, आफन्त देख्न नपाउँदाको अत्यास र अन्य विरामीको पीडायुक्त चित्कार ! यिनै कुराले उनलाई अत्यन्तै निराश बनाएको अनुमान गरेँ मैले । उनी त्यहाँको वातावरण र हेरचाह गर्ने परिचारिकाहरूको शान्त–चीसो व्यवहारले बढी डराएके देखिन्थिन । त्यसैले अपरेसन गरेका ठाउँमा घाउको दुःखाइभन्दा पनि आफ्ना कसैलाइृ भनेको बेलामा भेट्न नपाउनुको न्यास्रो र पूरै पराइपनको वातावरणमा सिर्जना हुने उच्चाहटले उनमा निरनशा छाएको हो कि भन्ने लागेको थियो । डा. रुकैयाको अनुमान पनि त्यस्तै थियो । त्यहाँबाट बाहिरको जनरल वार्ड वा केबिनतिर लान पाउँदा निश्चय नै उनको अवस्था बदलिनसक्थ्यो । चिकित्सकको रायमा अझै आवश्यकता अनुसार आइसियुको रेखदेख जरुरी थियो । भोलिपल्ट पनि डाक्टरले अझै राम्रो नभइसकेकोले आइसीयुमैं राख्दा ठीक हुन्छ भनेपछि अर्को विकल्प रहेन । 
  “लौन मलाई दुख्यो....। मार्छन यिनीहरूले मलाई ! पानी समेत खान नदिएर मार्न लागे । खान पनि दिँदैनन् ।” डाक्टरले होशमा आएको भनेका भए पनि उनी  भोलिपल्ट सम्म पूर्ण होसमा थिइनन्, । तन्द्रामैं जस्तो बर्बराइरहेकी थिइन् । अर्धचेतनमा के के भन्दै थिइ, के के । उनको अवस्था देखेर आँसु थाम्न मुस्किल पर्दैथियो मलाई । त्यत्तिकैमा उनको मुखबाट निस्कियो, “के मलाई साथै घर लान्छु भन्ठान्नुभा’छ ? अब मेरो आश छाडिदिनोस् !”
बेसुरको बर्बराइबीच निस्किएको उनको यस्तो भनाइले मेरा मेरा आँखा नजानेरै बर्सिन थाले, कति गर्द पनि रोक्न सकिन मैले । उनको अवस्था र निराश निराश अभिव्यक्तिबाट मेरा नौनारी गले । म दुवै हातले बिरामीको बेड समातेर अस्पतालको चिसो भुइँमा थुचुक्कै बस्न पुगेछु ।
उनलाई मैले आजभन्दा अगाडि कहिल्यै यति निराश देखेको थिइन । उनले अनेकौं रोगका आक्रमण नखेपेकी पनि होइन । २०३० सालतिरै मेनिन्जइटिसले हप्तौ बेहोश भएर त्यतिबेलाको शान्तभवनमा ढाडबाट पानी झिकेपछि नवजीवन पाएकै हो । आकश्मिक रुपमा अपेन्डिसाटिसको अपरेसन गर्दको पीडा पनि बेहोरेकै हो । पाठेघरको अपरेसन गरेर हप्तौं अस्पतालमा बिताएकै हो । हुँदा हुँदा मेरुदण्डके प्र्mयाक्चर भएर ६ महिनासम्म विछ्यौनामा एकै आशनमा बिताएकी पनि हो । ती कुनै पनि अवस्थामा उनले यसरी आत्मबल गुमाएकी थिइन । तर अहिले.....? त्यतिबेला उनको गुमेको आत्मबल र निराश निराश मनस्थिति देख्दा म भित्रभित्रै अताल्लिएको थिएँ । धेरै समय झेल्न नसकेर त्यो स्थिति म उनलाई त्यही हालतमा छाडी बाहिरिएँ, आइसियुबाट ।
जे होस डाक्टरले एनेस्थेसिया र अरु कुराको असरले गर्दा यस्तो भएके हो, बिस्तारै भोलि पर्सिसम्ममा पुरै होस आउँछ र सबै ठीक हुन्छ भनेका छन् । अझ उपचारपछि बाँकी दाया फोक्सोले ८० प्रतिशत काम गर्छ भनेकाले मन बुझाउन सकिएको छ । चार गते क्याविनमा सारेपछि बल्ल उनको मनस्थितिमा बिस्तारै फरक देखिन थाल्यो । आइसीयुमा  देखिएको निराशामा पनि कमी देखिँदैछ । जीवनप्रतिको आशा बढेझैं लाग्दैछ उनमा । लाग्छ यो आत्मबलले पनि रोग र डिप्रेससँग लड्न मद्दत गर्ला । वार्डमा आएपछि बीचमा कफ निकाल्दा अत्यन्तै कष्ट हुने नयाँ समस्या देखिए पनि स्वस्थ्यमा अरु खलको राम्रो सुधर आएको छ । ठोस केही खानेकुरा खान थालेकी छ । केही पाइला हिँड्न् थालेकी छ । यी सबै कुराले हामीमा पनि उत्साह पलाएको छ ।
अपरेसनको आठौं दिन तीनदिनपछि फलोपमा लानेगरी लक्ष्मीलार्ई लिएर होटेल गइयो । त्यसको भोलिपल्ट आलाके टोकियो फर्कियो, तेस्रो दिन अरुण क्यानाडाबाट आइपुग्यो ।   
अपरेसन पछि दश दिन पछि असार नौ गते बोलाइएको फलोअपमा पुग्दा अर्को बायोप्सी टेस्ट गर्नस्लाइड अन्यत्रै पठाउनु पर्ने पो भन्छन् । त्यसले गर्दा टेस्टको रिपोर्टका लागि अर्को एक हप्ता पर्खनु पर्ने भयो । डाक्टर सिंहको भनाइमा केमोको सुइ नै लाउने कि मुखबाट (ओरल केमो) दिए पनि हुन्छ भन्ने निक्र्योल गर्न यो परीक्षण जरुरी थियो ।
टेस्ट गर्नु नै थियो भने, पहिले गरेको भए पनि हुँन्थ्यो । अलमल्याउने चाल त होइन यो ? मनमा चिसो पस्नु स्वभाविक भए पनि उनैको अनुसार चल्नुको विकल्प थिएन । रिपोर्टको लागि असार २९ सम्म पर्खनु प¥यो । भोेलिपल्टै ३० गते भर्ना गरेर केमो शुरु गरियो । निर्धारित मात्राको औषधी एक वा दुई दिनमैं दिँदा बिरामीलाई सहन गाह्रो पर्ने भएकोले डा. दासले प्रत्येक चरण तीन दिन लगाएर दिने योजना बनाए । नेपालमा पनि त्यसरी नै एक चरणको केमो तीनदिल लगाएर दिने सल्लाह दिए । डा. सिंहले नेपालमैं बाँकी चार चरणको केमो सकेर सबै रिपोर्ट पाठाएर फोन वा इमेलबाट फलोअपको लागि आउनु पर्ने, नपर्ने सल्लाह दिने बताए ।
चारदिनको बसाइपछि अस्पताल छाडेर बल्ल साउन ३ गते विहानै काठमाडौंको लागि विमानस्थल हिँडियो । त्यसरी विमानस्थल पुग्दा मन उमङ्गले सिमलको भुवा झैं हलुको थियो । धेरै तनावबाट मुक्ति थियो त्यो मेरो । पहिलो केमोको नराम्रो असर नदेखिएर लक्ष्मी त्यति चाँडै घरफर्कन सक्ने भएकीमा मन प्रशन्न थियो । साथै अपरेसनको क्रममा र त्यसको अघि पछि पनि क्यान्सरको मानसिक भूतले तर्साउँदा घर फर्काउन पनि पाइने हो होइन भन्ने मानसिक त्राशबाट पनि मुक्ति मिलेको थियो । हामीलाई मात्र होइन, लक्ष्मीमा पनि अब केही हुँदैन भन्ने आत्म विश्वास जागेको थियो । लामो विदेश बसाइबाट न्यास्रिएको मन आफ्नै देशको माटोको सुवासमा लटपटिन पाउँदाको आनन्दानूभूतिले दिएकाो अर्को खाले रमाइलो लाग्नु छँदै थियो । 
त्यही हलुकापनमा विमानस्थलको सम्बन्धित काउन्टरमा पुग्दा भने ती पूर्व उमङ्ग सबै चकनाचूर हुन पुगे । सवारी सुविधादेखि स्टाफलगायत सबबाट पाइएको सहयोग र सेवाबाट अस्पतालले कमाएको मेरो मनभित्रको कृतज्ञताभावमा ग्रहण लाग्यो । टिकट दिन्छु त  बिरामी हवाइ सफरका लागि तन्दुरुस्त छ भन्ने चिकित्सकको प्रमाणपत्र नभई लैजान मिल्दैन पो भन्छन् । त्यो कुरा हामीलाई के थाहा ? अस्पतालले दिनु पर्ने हो, आइपिएलले यस्तो पनि लिनु है भन्नु पर्ने हो । दुबैले त्यसो गरेनन् । मारमा हामी पर्ने भयौं ।
अब के गर्ने ? बोर्डिङ हुुने बेला भइसक्यो । कन्ट्याक्ट गर्न पनि विमानस्थलमा आफ्नो मोवाइलमा इन्टरनेट चल्दैन । काउन्टरकै कर्मचारीको सहयोगमा अस्थायी नेट जोडिपछि अस्पतालमा फोन गरेँ । डाक्टरको फाने मरे लाग्दैन । आइपिएलमा गरेँ, हामी कुरा गछौं भन्छन् । समय मिनेट मिनेटमा चिप्लिँदै छ । अन्नततः डाक्टरको सहयोगी मुकेशसँग सम्पर्क भयो । ऊ भन्छ, डाक्टरकै सही नभई हुँदैन । डाक्टर अपरेसनमा भएकोले कतिबेला निस्कने हो भन्न सकिन्न । उसको कुरा सुनेर पहिलोपल्ट म पनि चर्कै रिसाउन पुगेछु । जतिसक्यो उति चाँडो इमेल गर्छु हेर्दै गर्नु भनेपछि सम्पर्क टुट्यो । नभन्दै त्यसो भनेको दश–पन्द्र मिनेटजति पछि इमेलमा आयो डा. भी.पी. सिंहले हस्ताक्षर गरेको “फिट टु फ्लाइट” को निस्सा । त्यसबीच झेलेको तनाव भने अत्यन्त कष्टकर थियो । त्यो निस्सा नआएको भए उडान छुट्ने संभावना रहन्थ्यो । हुन त अस्पताल सम्पर्क हुन नसक्दा अगाडि नै काउन्टर कर्मचारीले विमान सेवाका चिकित्सक कहाँ मेडिकल रिपोर्टहरू पठाइसकेका थिए । त्यो फिर्ता मगाएर बोर्डिङ पास लिए पछि बल्ल ढुक्क हुन सकियो । विदेशबाट उपचार पश्चात बिरामी घर फर्काउँदा लिनै पर्ने कुरा रहेछ यो, जसको ज्ञान नहुँदा थोरै समयको भए पनि तनाव बेहोर्नु प¥यो ।
       तीन हप्ता बित्यो दोस्रो चरणको केमो दिने समय आयो । नेपाल मेडिकल कलेजका डा. देवकोटाको परामर्श अनुसार नै भक्तपुर क्यान्सर अस्पतालमा बाँकी चरणको केमो दिने तय गरियो । डा. उज्ज्वल चालिसेको सहयोग र आत्मीय व्यवहार अनि सम्पूर्ण परिचारिका टोलीले प्रदान गरेको घरेलू वातारणको अनुभवले कुनै समस्या अनुभव गर्नु परेन ।
तर फर्केको दुई तीन दिनदेखि नै केमोले आफ्नो करामत देखाउन थालिहाल्यो । खाना पटक्कै नरुच्ने, देख्यो कि बमन हेलाजस्तो हुने । पेट हुँडलिएर आउने । कपाल त पूरै झरिहाल्यो । उनको छटपटी देख्दा हामीलाई समेत सहन कठिन पथ्र्यो । आठौं दिन भनिए अनुसारको रक्त परीक्षण गर्दा प्लेटलेट, टोटल ब्लडकाउण्न्ट र हेमोग्लोविन स्वाट्टै घटेको रहेछ । डाक्टरको सल्लाहमा चुकन्दर, पाकेको फर्सी उसिनेर ख्वाउनुका साथै भने अनुसार कै एन्टिबायोटिक्स दिँदा पनि सुबिस्ता नभए पछि डा. उज्ज्वलको सल्लाह अनुसार घरमैं औषधि मिलाएर सलाइन दिने व्यवस्था मिलाइयो । डा. चालिसेसँग हरेक दिन मोवाइमा सम्पर्क हुन्थ्यो, इमेलमा रक्तपरीक्षणको रिपोर्ट पठाउँथेँ । त्यो हेरेर पाइने निर्देशन अनुसर नै थप औषधि दिँदै गयौं । अहँ, कुनै सुधार देखिएन । भदौ १ गते त रातो र सेतो रगत चढाउन भर्नै हुन परिहाल्यो । उनमा दिल्लीमा अपरेसन पछि देखिएको निराशा फेरिए देखिन थाल्यो । फेरि जिन्दगीबाट आशा मार्न थालिन उनले । जे होस् रातो २ र सेतो ९ पिन्ट रगत दिएपछि अवस्था सुध्रियो, एउटा अर्को खड्गो ट¥यो । डाक्टर उज्जवलले मुटुमा समस्या हो कि भन्ने शङ्का गरे । त्यहाँ कार्डियोलोजिस्ट र त्यससम्बन्धी उपचारको सुविधा थिएन । त्यसैले एम्बुलेन्समा ओम अस्पताल लग्यौं, इको र विशेष प्रकारको रगत परीक्षण भयो । मुटुमा केही समस्या नै देखियो । त्यसै अनुसारको औषधि दिँदा पनि नभएपछि पर्सिपल्ट फेरि महाजगन्जस्थित मनमोहन कार्डियो भास्कुलर सेन्टर भर्ना नगरी सुख्खै पाइएन । सिट नभएर इमजेन्सी कुर्दा कुर्दै आधारात वित्यो । ज्वाइँ डा. राजेन्द्र गुरागाईको प्रयासबाट रातको १२ बजे बल्ल एउटा केबिन उपलब्ध हुनसक्यो ।
भर्ना हुन, बेड पाउन  र सिनियर चित्किको सेवा लिन समेत भनसुन नै चाहिने साबिक रोगको शिकार हुनु परेरेै त होला, राज्यकोषको ढुकुटी सिध्याएर उपचारका नाउँमा विदेश धाउने बाहेक हामी निरीह जनता समेत घरखेत बेचेर आवश्यक उपचारको लागि विदेशिन बाध्य पारिन्छौं । सार्वजनिक सरकारी अस्पतालहरूको सेवा, व्यवहार र सुविधा विदेशी अस्पतालमैं जस्तो हुँदो हो त यस्तो बाध्यता रहँदैनथ्यो होला ।
एक हप्ताको मनमोहन बसाइबाट अवस्थामा सुधार आयो । तेस्रो चराणको केमो दिन मिल्ने भएकोले घरै नगई त्यतैबाट फेरि भक्तपुर लगियो बिरामीलाई । यस पल्ट अस्पलातमा पूरै तीन हप्ता बिताउनु प¥यो ।
अब त कुनै समस्य नआउला भनेको, सेचेजस्तो के हुन्थ्यो । प्लेटलेट फेरि ६ सयमा झरेछ । डाक्टरले भने अनुसार रातारात भक्तपुर पुगेर गोविन्दले (गोविन्द अधिकारी) प्लेटलेट बढाउने सुइ ल्याएर दिएपछि प्लेटलेटको समस्या ठीक भए पनि अर्को समस्या देखाप¥यो । पिसाबमा संक्रमण देखिएर नेपाल मेडिकल कलेजको इमर्जेन्सी वार्ड नपु¥याइ धरै पाइएन । 
अशोजको पहिलो हप्ता दिनु पर्ने केमो सेतो रगतको मात्रा लगायत अन्य तत्व चाहिनेभन्दा बढी देखिएपछि दिन मिलेन । दुई तीन दिन अस्पताल बसेर दशैंपछि आउने गरी फूलपातीको अघिल्लो दिन घर फर्किनु प¥यो । दशैंको टीका सकेर फेरि अस्पताल भर्ना भएर बल्ल चौथो केमो दिन सकियो । १९ गते घर फर्केका थियौं, तेस्रो दिनदेखि फेरिे अनेकौं जटिलता देखिन थाल्यो ।
भक्तपुरले यस पटक पनि कार्डियाक समस्या नै देखाएर मनमोहन  पठायो । उता मनमोहनका डक्टर कार्डियाक सम्बन्धी समस्या होइन, यहाँ भर्ना गर्न मिल्दैन भन्छन् । केही नलागेपछि टिचिङ अस्पताल लग्नु प¥यो । त्यहाँ पनि क्यान्सरको समस्या हो, भक्तपुर नै लानोस् भन्छन् । के गर्ने कसो गर्नेको बीच छट्पटाउनु बाहेक अर्के उपाय थिएन । एउट नागरिकले शिुल्क होइन लागेको सबै खर्च बोहेर्छौं, भर्ना गरेर उपचार गर्देऊ भन्न्दा समेत नपाइने यस्तो अवस्थाले न हो सिंगो सरकारप्रति वितृष्णा फैलने । अनि त्यो वितृष्णाले विद्रोहजन्य तोडफोडको निकास नखोजेर के गरोस् त ? धन्न हामी नेपाली अत्यन्त सहनशी रहेछौं, जेजस्तो अव्यवस्था पनि सजिलै सहिदिने । एउटा सरकारी अस्पतालले नै सिफारिस गरेर पठाएको गंभीर बिरामीको समेत यस्तो रमिता बनाउने मनमोहन र टिचिङ अस्पतालका केही चिकित्सकको अमानवीय र असंवेदनबील व्यवहार नै त हो सबै सरकारी अस्पताल र डक्टरहरूप्रति वितृष्णा र घृृणा उत्पन्न गराउने !
यी अस्पतालहरूमा बेला बखत रोगीका आफन्तहरूले तोडफोड गरेको समाचार सुनिन्थ्यो । अस्पतालजस्तो ठाउँमा किन त्यसो गरेको होला भन्ने लग्थ्यो । यतिबेला आफ्नै बिरामीले बेहोर्न परेको अमानवीय व्यवहारबाट लाग्यो यस्तै भएर त होला ! मनमोहनमा भक्तपुरबाट डा. उज्ज्वलले पठाएका थिए । त्यहाँ भर्ना नलिएको जानकारी गराएको केही बेरपछि डा. उज्जवलको फोन आयो– डा. अच्यूतसँग कुरा गरेको छु, पठाइदिनोस् भनेका छन् । लानु भए हुन्छ । उनले इमर्जेन्सीमा भनिसकेका छन् ।
मलाई भने त्यहाँका डाक्टरको सुरु व्यवहार देखेर लानै मन लागेन । किन माथिल्लो पदाधिकारीलाई भन्नु भनेर मात्र, नभए टिचिङमा भर्ना गर्न खासै समस्या थिएन । अर्को सुरुमा डा. गुरागाईसँग फोन कन्ट्टयाक्ट हुन सकेन । उहाँसँग सम्पर्क भएर समस्या राखेको केही बेरपछि त पहिले भर्ना गर्न पर्दैन लैजानोस् भन्ने डाक्टर आफैं आएर भर्ना प्रक्रिया अघि बढाइहाले । यो थियो हाम्रो सरकारी÷सामुदायिक अस्पतालहरूको यथार्थ । सोर्सफोर्स बिना रोगीले उपचार समेत पाउन नसक्ने ! ठूलाबडाहरू रुघा लागेर अस्पताल आउँदा पनि डाक्टर र नर्सको लाम लाग्ने मेरो देश, सार्वभौम भनिने एउटा नागरिक सिकिस्त भएर अस्पताल पुग्दा पनि भर्ना हुन नपाएर फर्कनु परेर अकाल मृत्युको यथार्थ भोग्छ । हाय रे मेरो डिम्बना ! निजी र विदेशका अस्पतालको दाना पानी पो खेल पो हो ?
जे होस् भर्नाको महाभारत जसरी तसरी जितियो । डा. उज्जवललाई पनि जानकारी गराएँ । डा. गुरागाइँको अनुरोधमा मनमोहनका डा. अच्युत पौडेल र अर्का एक जना विशेषज्ञ टिचिङमै आएर हेरिदिने भए । यसरी अशोज ३१ गते भर्ना भएर एघार दिन त्यहीँ बिताएपछि बल्ल घर पर्किन पाइयो ।
भक्तपुर छँदै माछा खाँदा लक्ष्मीको जिब्रोमा काँडाले घोचेको थियो । त्यतिबेलैदेखि कहिले कहिँ चस्कियो भने पनि ठूलो यसले ठूलो ल्याउला भन्ने न डाक्टरले सोचे, न हामीले सोच्यौं । केही पछि कान दुख्यो भनेर टिचिङ अस्पतालमा परीक्षण गराउँदा पो कान नभएर काँडा बिझेको जिब्राको त्यही गिर्खोको कारण पीडा भएको थाहा भयो । निश्चित हुन गिर्खोबाट पानी निकालेर जाँचियो । त्यतिले नपुगेर बायोप्सी गर्दा त्यसको रिपार्टले जिब्रोमा क्यान्सर देखाए पछि फेरि मैले टेकेको धैर्यको जमिनमा ठूलो पहिरो खस्यो । फोक्सोको क्यान्सलाई पराजित गरेको मेरो मिथ्या भ्रमको पर्दा च्यातियो ।
अपोलोका अस्पतालका चिकित्सहसँग निरन्तर सम्पर्कमा थियौं । उनीहरूले केमो दिँदा समस्या आएको भए चौथो पछि थप रोक्नेसल्लाह दिएका थिए । डा. उज्ज्वल र डा. गुरागाइले पनि टिचिङ अस्पतालका क्यान्सर विशेषज्ञहरूसँग सल्लाह गरेर पनि एक पटक पेट सिटी गरेर मात्रै निर्णय गर्नुपर्ला भन्ने राय दिनुभयो । पेटसिटीको लागि सौर्य डाइनेस्टिकले दिएको समयमा नैे परीक्षण भयो । निर्धारित समयं चैतको शुरुमा पेट सीटी स्क्यानको रिपार्टले हातप¥यो । फोक्सोमा डराउनु पर्ने क्यान्सरको ग्रन्थीहरू नदेखिए पनि जिब्रोमा भने क्यान्सर देखियो । त्यसले घाँटीतिर पनि जरो फैलाइसकेछ । फेरि अर्को पहाड खस्यो हाम्रो विश्वासमाथि । दिल्लीदेखि दुष्ट क्यान्सरलाई परास्त गरेको  अनुमान त मात्र भ्रम पो रहेछ । आखिर खोस्ने नै भयो जीवनसंगिनीलाई । मनमा यस्तै कुरा खेलाउनु बाहेक के नै गर्न सकिन्थ्यो र ?
पेट सीटीको रिपोर्ट हेरेपछि डा. गुरागाइँले फेरि अन्कोलोजिस्टसँग सल्लाह गरेर हल्का खालको कम मात्राको केमो दिनु राम्रो हुने सल्लाह दिनुभयो । फेरि भक्तपुर कै शरणमा पुगियो डा. उज्ज्वलसँगको सल्लाहपछि । चैत १४ गते शुरु गरेर सात दिनभित्र तीन चरण पुरा गरियो एक दिने केमो । अफसोच, कुनै उपाय लागेन । असह्य पीडासँगै शरीर क्षीण हुँदै गयो । असह्य पीडा र समस्याका बीच २७ गते अस्पताल पु¥याए पनि असह्य पीडा र वेदना मेरो भागमा छाड्दै भोलिपल्ट विहान ८. ५५ बजे उनी कार्डिक एरेस्टको प्रहारबाट बिदा भइन् संसारबाटै । पचास वर्ष पुग्न ठीक एकहप्ता बाँकी थियो, त्यति पनि पनिन् उनले !


Tuesday, July 10, 2018

भानुभक्त र देवकोटाका भाषा

(संरचना पूर्णाङ्क ५, फागुन–चैत २०३८ मा प्रकाशित यो लेख नेपाली भाषाका महान् व्यक्तित्व भानुभक्तको स्मृतिमा यथावत पोष्ट गर्ने धृष्टता गरेको छु । ) भानुभक्त र देवकोटाको भाषा – विजय चालिसे आदिकवि भानुभक्त आचार्य नेपाली भाषा र साहित्यका उत्तर मध्यकालका प्रतिनिधि कवि हुन् भने महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा आधुनिक भाषा साहित्यका प्रतिनिधि कवि हुन् । त्यति मात्र नभएर भानुभक्तले नेपाली भाषालाई जसरी साहित्यको माध्यमको रूपमा प्रष्ठिा दिए देवोटाले स्वच्छन्दतावादी (रोमाण्टिक) धाराको पूर्णतः प्रतिनिधित्व गर्दै विकसित रूप पनि प्रदान गरे । प्रस्तुत चर्चामा भानुभक्त र देवकोटाका भाषाको छोटकरी छलफल गर्नु भएकोले अन्य प्रसंग कोट्याउनु शायद आवश्यक नपर्ला । देवकोट र भानुभक्तको भषामा तुलनात्मक विवेचना गर्नुभन्दा अघि के कुरा विचार गर्नु पर्छ भने भानुभक्तको भन्दा देवकोटाको समयमा युगचेतना र युग परिवर्तनको प्रवाहद्वारा नै पनि ज्यादै परिवर्तन आइसकेको पाइन्छ । त्यसैले पनि समयसापेक्ष दृष्टिकोणबाट हेर्ने हो भने भानुभक्तको समय भन्दा देवकोटाको समयमा औद्योगिक विकास, शैक्षिक विकास, राजनीतिक युगचेतना, संचार र साहित्यको विकास आदिले गर्दा अवश्य नै नवीन धाराको प्रयोग साहित्य र भाषा लगायत अन्य कुराहरूमा पनि भइसकेको पाइन्छ । तसर्थ उही परिप्रेक्षमा भानुभक्त र देवकोटाको प्रयोगलाई तुलना गर्न सकिँदैन । तर यसको अर्थ यो पनि होइन देवकोटा भानुभन्दा विशेष छन् या भानु देवकोटाभन्दा विशेष छन् र देवकोटालाई युगचेतना र समयले गर्दा नै महाकवि बनायो । भनाइको तात्पर्य कालसापेक्ष दृष्टिकोणबाट हेर्दा नेपाली साहित्यका यी दुवै महारथिहरूको योगदान नेपाली साहित्यमा प्रचूर मात्रामा रहेको छ भन्न सकिन्छ, जसको ऋण नेपाली साहित्यले तिर्न सक्तैन । किन भने भानुभक्तले विशुद्ध नेपाली साहित्यको जग बसाएर एउटै भाषा एउटै साहित्यको शंखनाद गरे भने देवकोटाले वेदान्त र आध्यात्म दर्शनको शास्त्रीय परम्पराबाट नेपाली साहित्यबाटै अत्याआधुनिकताको घेराभित्र पु¥याए । भानुभक्तको समयमा नेपाली भाषामा साहित्यको प्रयोग भर्खर भर्खरै मात्र हुन थालेको पाइन्छ । यसको फलस्वरूप उनको भावोद्घाटन गर्न वा भाव प्रकट गर्नको लागि अभिधाशक्ति नै पर्याप्त थियो । त्यसैले उनले प्रायः आफ्ना काव्यहरूमा अभिधाशक्ति वहन गर्ने शब्दहरूबाटै काम चलाएको पाइन्छ । यता देवकोटाको समयमा आइपुग्दा विचारको गहिराइ, जीवन, जगत र समाजका सूक्ष्मातीसूक्ष्म भावधारा र विवेचना तथा मनोविश्लेषण आदि प्रकट गर्नको लगि अभिधा मात्र पर्याप्त भएन र लक्षणा, व्यञ्जना र अन्य शक्ति समेतलाई वहन गर्ने शब्दहरूको आवश्यकता पर्न गयो । यी वास्तविकतापूर्ण तथ्यले पनि आनुभक्तकालीन साहित्य र भाषाले भन्दा देवकोटाकालमा नेपाली साहित्य र भाषाले अर्कै केल्टे फेरिसकेको हुन्छ । भानुभक्तो समयको समाज र जनजीवन जति सरल थियो देवकोटाको समयसम्म आइपुग्दा त्यो उति नै जटिल हुँदै गएको छ । यसले गर्दा समयसापेक्ष रूपमा कुनै पनि कालको भाषा र साहित्यले आफ्नो जनजीवन र समाजको पूर्ण प्रतिनिधित्व अवश्य नै गर्नु पर्ने हुँदा भानुभक्तको समयको भन्दा देवकोटाको समयको भाषा र साहित्यको निर्माण तथा विकासमा त्यही अनुरुप भिन्नता आइसकेको हुन्छ । भानुभक्तकालीन युगमा शिक्षाको प्रचार कम थियो भने देवकोटाको समयमा आइपुग्दा तुलनात्मक रूपमा शिक्षाको प्रसार प्रशस्त मात्रामा भइसकेको पाइन्छ । फलतः भानुभक्तको समयमा विदेशी भाषा र साहित्यसँगको परिचय नहुँदा त्यसको प्रभाव पनि शून्यप्राय थियो भने देवकोटाको समयमा आइपुग्दा त्यसको प्रभाव पनि स्वभावतः बढिसकेको थियो । त्यसैले गर्दा पनि देवकोटाकालीन नेपाली भाषा र साहित्यमा विशेष भाव वहन गर्न सक्ने शब्दहरूको बढी प्रयोग र विदेशी शब्दहरू बढी भित्रिनुका साथै विभिन्न साहित्यिक वादहरूको प्रयोग र प्रभाव नेपाली साहित्यले आफूभित्र समेटिसकेको पाइन्छ । भानुभक्तपछिको नेपाली भाषा र साहित्यमा अलिअलि गर्दै विदेशी भाषाका शब्दहरूको प्रचलन हुन थालेको पाइन्छ । मोतीराम भट्टको पालामा नै केही मात्रामा उर्दू शब्दहरूको प्रचलन बढेको भेटिन्छ भने श्री ५ शुरेन्द्रको पालामा भएको मुलुकी ऐेनको प्रचलनले उर्दू–फारसी भाषाको शब्दहरूलाई बढी मात्रामा नेपाली शब्दभण्डारमा प्रवेश गरायो । त्यसको प्रभाव पछि पनि शाही–दरबारी भाषा र अड्डाअदालतमा प्रयोग गरिने भाषामा प्रचूर मात्रामा अझै पाइन्छ । यसरी नेपाली भाषाले उर्दू–फारसीका शब्दलाई आत्मसात ग¥यो भने अङ्ग्रेज तथा अन्य पर्यटकहरूको आवागमन, विदेशी साहित्यको पठन पाठन र प्राविधिक–वैज्ञानिक उत्पादन उपलब्धिको आगमन प्रयोगबाट अन्य भाषाका शब्दहरू पनि नेपाली भाषामा भित्रिन पुगे । जसबाट देवकोटाकोटा मुक्त हुनसक्ने प्रश्नै थिएन । त्यसैले पनि भानुभक्त र देवकोटाको भाषामा महत्वपूर्ण भिन्नता हुने नै भयो । यिनै कारणहरूले गर्दा पनि भानुभक्तको भाषा र साहित्यमा जुन सरलता, सुवोधता र सहजसंप्रेषणीयत पाइन्छ देवकोटाका सबै कृतिमा र तिनका भाषामा पाइँदैन । युग र परिवर्तनको गतिलाई हेर्दा तिनै कुरा पाउने अपेक्षा राख्न पनि सकिँदैन । अनि देवकोटाको समयमा नेपाली भाषा आगन्तुक र संस्कृतका तत्सम, तद्भव आदि शब्दको प्रचलन र नेपालीकरण आदिले गर्दा पनि भानुभक्तले प्रयोग गरेको नेपाली भाषाको तुलनामा निक्कै धनी भइसकेको थियो । अर्को तर्फ भानुभक्तलाइ संस्कृत व्याकरणको नियममा चल्नुका साथै त्यसको सीमारेखा भंग गर्नु पर्दा संस्कृतका विद्वानहरूको चर्कोे खप्की खानु पर्ने डर थियो । व्याकरणसम्मत एकरूपताको प्रश्नै थिएन भने देवकोटासम्म आइपुग्दा नेपाली भाषाले हेमराजको चन्द्रिका र सोमनाथको मध्यचन्द्रिका जस्ता व्यारण (संस्कृत व्याकरणमा आधारित भए पनि) पाइसकेको थियो । जसले गर्दा नेपाली भाषाको एकरूपता र नियमबद्धता तथा शब्दको वाहुल्यताले गर्दा पनि भानुभक्तको समयको र देवकोटाको समयको भाषामा निक्कै भिन्नता र समृद्धि आइसकेको थियो । देवकोटाले संस्कृतका अति क्लिष्ट शब्दहरूको समेत प्रयोग गरेका छन् जसको अर्थ संस्कृतमा राम्रो ज्ञान नभएका पाठकलाई लाग्न सक्तैन । यसको कारण देवकेटाको गहिरो प्रतिभा र कल्पनाशीलताले गर्दा उनलाई सामान्य शब्दभण्डार पनि अपर्याप्त भएको हुनसक्छ । फलतः उनी संस्कृत शब्दलाई पर्याप्त मात्रामा तद्भव बनाएर र नयाँ शब्दको निर्माण समेत गरी प्रयोग गर्न पछि हट्दैनन् । त्यति मात्रै नभएर उनी भाव र कल्पनाको प्रवाहमा वहँदा व्याकरणको नियमबाट समेत फुत्किन खोजेको पाइन्छ । यसरी देवकोटाकालीन भाषा र साहित्य नेपाली साहित्यको सम्वृद्ध भाषा र साहित्य मान्नमा शायद अतिशयोक्ति नहोला, जसले अर्थशक्तिमा व्यञ्जना र लक्षणालाई अँगालेर भाव संप्रेषण गर्न सफलता पाएको छ । अन्त्यमा भानुभक्त र देवकोटामा पाइने केही भाषिक विशेषताहरूको उल्लेख गर्दै प्रस्तुत चर्चा रोक्नु ठीक पर्ला । (क) भानुभक्तका केही विशेषता १. संस्कृत भाषाका ज्ञाता भएर पनि संस्कृत व्याकरणको प्रयोग नगरी अलिखित प्राकृत–नेपाली व्याकरणको प्रयोग गर्नु । २. संस्कृतका तत्सम र हिन्दी, उर्दू शब्दहरूो हलन्त र अन्य प्रयोगद्वारा नेपालीकरण गरी नेपालीपन दिने प्रयास गर्नु जस्तो– राम्, दिन् आदि । ३. अरु कुनै कुनै कविहरूले गरेको गरे झैं छन्द मिलाउनको लागि मात्रै सबै हलन्त उच्चारण हुने होस्, गर्छन् जस्ता क्रियाको अजन्त र आरान्तलाई ऐकारान्त बनाई प्रयोग गर्नु । ४. नेपाली भाषा अँगालेर विशुद्ध नेपाली भाषाको प्रयोग गर्नु । ५. संस्कृतको ज्ञाता भएर पनि पाण्डित्य प्रदर्शन गर्नपटि नलागि सामान्य जनताले बुझ्ने भाषामा साहित्य श्रृजनाको श्रीगणेश गर्नु । (क) देवकोटाका विशेषता १. उपसर्ग र परसर्गको प्रशस्त प्रयोग गर्नु– भानुभक्तले पनि यसको प्रयोग नगरेका होइनन्, तर उनी लगायत पछिका अरु पनि कविहरूले उपसर्ग र परसर्गको प्रयोगमा ज्यादै कम ध्यान दिए भने देवकोटाले यसको पर्याप्त पयोग गरेको पाइन्छ । २. संस्कृतका प्रत्ययान्त र समस्त शब्दहरूको प्रचूर प्रयोग देवकोटाले गरेका छन् जसको प्रयोग भानुभक्तले गरेको पाइँदैन । ३. देवकोटाले भाषालाई पनि बाढीका रूपमा लिएका छन् जसमा भावको धमिलो र कञ्चन दुवै पन पाइन्छ, त्यसैले उनी साहित्यमा व्याकरण र छन्दको नियमलाई पनि गौण मान्दछन् । ४. देवकोटाले स्वनिर्मित भाषाको पनि प्रयोग गरेका छन् । जस्तो– फुलारु, मान्द्रिलो, टोप्पिएर आदि । ५. कालको प्रयोगमा भानुभक्तले सामान्य कालको मात्र प्रयोग गरेको पाइन्छ भने देवकोटाले विभिन्न कालको प्रयोग गरेका छन् । ६. देवकोटाले हलन्तको पयोग हटाए पनि लोकछन्दमा चाहिँ लेख्य रूपमा अजन्त प्रयोग उच्चारणमा हलन्तको प्रयोग गरेको मुनामदनमा पाइन्छ ।

Friday, June 22, 2018

श्रीहरि उवाचः

(बहुआयामिक श्रीहरि पुयाँलः अभिनन्दन ग्रन्थ २०७५ मा प्रकाशित) मलाई स्वान्तसुखायको आत्मरतिका लागि लेख्ने साहित्यकारभन्दा जीवनका लागि सोद्देश्य लेख्ने साहित्यकार बढी मनपर्छ । त्यसैले पनि श्रीहरि फुयाँल मलाइ पर्ने साहित्यकारहरूको अग्रपङ्क्ति मै पर्छन् । समतामूलक उन्नत राष्ट्र मान्छेभित्रको स्वाभिमान, अग्रगामी समाज र राष्ट्रियताप्रतिको अनुरागको चाहनाबाट निरन्तर सृजनरत श्रीहरि फुयाँल यिनै प्रखर वैचारिक चेतनाका कविहुन् । सरस, सरल शैलीका गम्भीर मिलनसार कवि फुयाँल तीसका दशकको उत्तरार्धदेखिका असलमित्र हुन् मेरा । हाम्रो प्रारम्भिक सम्पर्कसूत्र थियो गोरखापत्र सस्थान । म आफंै पनि केही न केही लेख्न मनपराउने र संस्थानका प्रकाशन गोरखापत्रको शनिवासरीय परिशिष्टाङ्क र मधुपर्कको सम्पादन समूहमा कार्यरत । त्यसबाहेक पनि मित्र अमरकुमार प्रधान, तेजप्रकाश श्रेष्ठसँग मिलेर हामी आफ्नै प्रकाशन साङ्ग्रिला त्रैमासिकको पनि प्रकाशन प्रारम्भ गरेका थियौं । श्रीहरिजी प्रकाशनार्थ आफ्ना कविता लिएर आउनुुहुन्थ्यो । त्यतिबेला अहिलेजस्तो मधुपर्क, छु्ट्टै विभाग र सम्पादक अन्र्तगत थिएन । गोरखापत्रकै अङ्गका रूपमा प्रकाशित हुने सहप्रकाशन मधुपर्कको प्रधान सम्पादकमा पनि गोरखापत्रकै सम्पादकको नाम रहन्थ्यो । त्यसैले कामकाजी सम्पादकमा अरु सम्पादकहरूलाई तोकिएको हुन्थ्यो । यसैले मधुपर्कको सम्पादकीय नेतृत्व गोरखापत्रकै प्रधान–सम्पादकमा रहन्थ्यो । त्यसैले त्यतिबेला प्रधान–सम्पादकमा गोकुलप्रसाद पोखरेल रहनु भए पनि मधुपर्कका साथै गोरखापत्रका साहित्यिक पृष्ठ र बेला बेलामा प्रकाशित भइरहने विभिन्न विशेषांकको सम्पादन–संयोजनको जिम्मेवारी कार्यकारी सम्पादकहरू नारायणबहादुर सिंह र केशवराज पिँडालीमा थियो, उहाँहरूको कनिष्ठ सहयोगीमा त्यतिबेला म कार्यरत थिएँ । त्यसैले गोरखापत्रमा आउने साहित्यिकाहरूसँग नयाँ नयाँ परिचय भइरहन्थ्यो । केही आफूलाई विशेष ठान्नेहरू थिए भने कोही नारायण माड्साव र कोही पिँडाली दाइ (गोरखापत्रमा हामी उहाँहरूलाई यही सम्बोधन गथ्र्यों) को निकट बनेर प्रकाशित हुने बढी अवसरको खोजीमा रहन्थे । त्यतिबेला छापिनु पनि ठूलै कुरा हुन्थ्यो । निजिस्तिरका रूपरेखा मासिक, रचना त्रैमासिक लगायत केही सीमित प्रकाशन थिए । अहिलेजस्तो अनेकौं दैनिक अखबार थिएनन् । त्यसमाथि गोरखापत्रका प्रकाशनमा छापिएपछि बीसदेखि चालीस पचास रुपियाँसम्म पारिश्रमिक समेत पाइन्थ्यो । यो रकम त्यो बेला ठूलै मानिन्थ्यो । केही नवोदित साहित्यकारहरू भने हामी कनिष्ठ सम्पादकसँग पनि मित्रवत् सम्बन्ध राख्न खोज्थे । तिनै केही मिलनसार साहित्यकारमध्ये पर्थे श्रीहरि फुयाँल, जससँगको सम्बन्ध आजसम्म नै मित्रवत् रहेको छ ! सधैंको हँसिलो अनुहार, मीठो मुस्कान सहितको नरम बोली, भनी नबिझाउने सरल स्वभाव, तर वैचारिक आस्थाप्रति इस्पातजस्तै ननुहिने कठोर स्वभावमा मैले श्रीहरि फुयाँल “सिरु” उमेरको स्वाभाविक परिर्तन बाहेक कहिल्यै कुनै परिवर्तन देखिन । “नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानमा पार्टीको भागबण्डामा राखेर साहित्यकारको नाममा प्राज्ञ बनाइएका छन्, तर उत्कृष्ट ढङ्गले साहित्यिक गतिविधि गर्ने, दर्जनौं पुस्तक प्रकाशन गर्ने चर्चित साहित्यिक प्रतिभाहरू ओझेलमा परेको” मा (जनमत, श्रीहरि फुयाँल विशेषङ्क २०७२) अरु धेरैकोजस्तै विगत चार दशकदेखि निरन्तर सृजनरत फुयाँलको पनि मन दुःख्नु स्वाभाविक हो । शक्तिकेन्द्रको वरिपरि धाएर र तिनैका सामु हात जोडेर मात्र पाइने हो भने त्यस्तो प्राज्ञको जागिरभन्दा स्वतन्त्र लेखन लाई नै सही प्राज्ञत्व ठान्नेमध्येका एक फुयाँलको स्वाभिमानलाई उल्लेख्य मान्नुपर्छ । वि.सं. २०१५ मा राजधानीनिकट नुवाकोटको अहिले ककनी गा.पा.–१ जलुकिनीमा जन्मेका श्रीहरि फुयाँलले लेखनको आफ्नो महायात्रा संभवतः २०२८ सालतिर नयाँयुग सािप्ताहिकमा प्रकाशित “किसान” शीर्षक कविताबाट प्रारम्भ गरे । त्यसपछि उनको यो सृजनयत्रा निरन्तर त्रिशूलीकै गतिमा अघि बढ्यो । २०३६ सालको सडक कविता क्रान्ति लगायतका साहित्यिक आन्दोलमा सक्रिय सहभागिता जनाउँदै कविता, खण्डकाव्य, महाकाव्य, कथा, उपन्यास र समालोचनाजस्ता साहित्यका विभिन्न भङ्गालाहरूमा उनका सृजनाहरू एकपछि अर्को थपिँदै गए । सङ्ख्यामा मात्र नभएर स्तर र वैचारिकतामा अरु खारिँदै गए, प्रगतिवादी केन्दीय चेतनामा स्पष्ट पहिचान निर्माण गर्दै गए । गद्य कविताका रूपमा मुक्तछन्दको बोलबाला भएको त्यो समयमा छन्दबाट पनि आधुनिक र वैचारिक साहित्य लेख्न सकिन्छ भन्ने पूर्ववर्ती अग्रज साहित्यकारहरूको काँधमा काँध थापेर त्यही अभियानको सशक्त अभियन्ता बन्दै गए । यसरी शास्त्रीय छन्दका सफल प्रयोक्तामध्येका प्रमुख सर्जकका रूपमा सुरक्षित छ उनको नाम । अझ नारावादी हुनुको आरोप खेपिरहेको प्रगतिशील साहित्यलाई रोमान्सेली क्रन्तिकारीताबाट जीवनपरक यथार्थवादी धारमा कलात्मक अवतरण गराउने मध्ये महत्वपूर्ण योगदान दिँदै आएका छन् फुयाँलले । म कुनै समालोचक होइन । मात्र पाठक हुँ । त्यसैले फुयाँलका सार्थक रचनाकृतिहरू बारेमा समालोचनात्मक धारणा प्रकट गर्ने क्षमता पनि राख्दिन । तर पाठकको दृष्टिले यतिसम्म निर्धक्क भन्न सक्छु– श्रीहरि फुयाँलको लेखनको विषय मान्छे हो । उनको लेखनको मूल प्रवृत्ति मानव नै हो । यस अर्थमा मान्छेकै समतामूलक विकास र उन्नति उनको लेखनको अभीष्ट हो । प्रमाणमा तलका दुई दृष्टान्त नै पर्याप्त होला– द्यौता हैन मान्छे हुँ, मान्छेको गर्छु आदर मान्छेकै डरले भाग्छु, मान्छेकै लाग्छ आदर ! (कृष्णप्रसाद पराजुली ः आस्थाका आयाम, २०४६) म मान्दिन कुनै द्यौता अन्धो धर्म म मान्दिन मान्छेलाई घृणा गर्ने ठग्ने शास्त्र म मान्दिन सामन्ती क्रूर ती ठालु देख्ता मान्छु घृणा म ता मान्छेको हकमा लड्ने जो छन् मान्दछु देवता ! (आँसुको सङ्ग्राम) युवा वर्ष मोती पुरस्कार(२०५३), लेखनाथ काव्य पुरस्कार, युगान्तर साहित्यिक पुरस्कार, (२०६१) तन्नेरी प्रतिभा सम्मान (२०६१), लेखनाथ काव्य पुरस्कार (२०७०) लगायत विभिन्न विभिन्न प्रकारका सम्मान पुरस्कारद्वारा सम्मानित–पुरस्कृत मित्र श्रीहरि फुयाँलका दर्जनभन्दा बढी कृति प्रकाशित छन् । पहिलो कविता सङ्ग्रह “किसान (२०२९)” पछि लामो अन्तरालमा दोस्रो कवितासङ्ग्रह “अन्तरका सुसेली (२०५९)” प्रकाशनमा ल्याए । पहिलो कविता सङ्ग्रह पछि उनको साधना खण्डकाव्य, शोककाव्य र उपन्यासतर्फ आकृष्ट हुन पुग्यो । यस क्रममा उनका “आत्मज्वाला (२०३२”), “आमाको सम्झना (२०४७))” “अमर सहिद राजन रायमाझी (२०६१”) जस्ता काव्य र “भूल कि फूल (२०३) शीर्षक उपन्यास प्रकाशित भए । यही साधनाले उनलाई “आँसुको सङ्ग्राम (२०६३)” र “कर्मयोगी देवकोटा (२०६४)” जस्ता सफल महाकाव्य लेखनको सिद्धि प्रदान भयो । उनका “भावनाका भुल्का (२०७०” मुक्तक संग्रह र “मनका छाल (२०७०)” हाइकु सङ्ग्रह पनि प्रकाशित छन् । त्यति मात्र नभएर फुयाँल “नेपाली दुःखान्त गीतिकाव्यको विवेचना (२०५७)” “नुवाकोटेली साहित्यको इतिहास (२०६८)” र “कृष्णप्रसाद पराजुली ः आस्थाका आयाम (२०४६)” को प्रकाशन पश्चात सफल र प्रभावशाली स्रष्टा मात्र नभएर गम्भीर द्रष्टाका रुपमा समेत स्थापित भएका छन् । मित्र श्रीहरिबाट नेपाली वाङ्मयले अरु धेरै योगदान पाउने विश्वास सहित हार्दिक शुभकामना !

Sunday, May 20, 2018

मृत्युस्पर्श र टिकट बिनाको रोमाञ्चक यात्रा !

शीर्षक  देखेर तपाईँलाई अनौठो लाग्ला । विना टिकट बस यात्रा त गरिंदैन भने बिना टिकट त्यो पनि हवाइ यात्राको कुरा । पत्याउन त्यति सजिलो पनि नलाग्ला । मलाई भने त्यो संझेर अझै पनि रोमाञ्च हुन्छ । कल्पना जस्तै लाग्ने यो कुुरा जोमसोम विमानस्थलमा भोगेका थियौं तेज र मैले । २०५८ कार्तिकको समय थियो त्यो । तेज र म श्रीमान श्रीमती नै मुक्तिनाथ यात्रामा थियौं । पोखरासम्म बस र त्यहाँदेखि विमानमा जोमसोम आएका हाम्रो योजना घोडेपानी हूँदै नयाँ बाटो भएर फर्कने थियो । त्यसैले हवाइजहाजको एकोहारो टिकट लिएर गएका थियौं ।
तर यात्रा निश्चित हुदैन, जीवनयात्रा सोचेझैं सरल रेखामा चल्दैन । हामीलाई पनि त्यस्तै भयो । कागवेनीबाट ठाडै ढुंगे बाटो, उडाउला झैं तेज हावाको झोक्का सहँदै टाङटुङ टिङटाङको समवेत सङ्गीतधून बजाउँदै तल झर्दै गरेका खच्चरका लामसँग बच्दैबच्दै उकालो लाग्दै थियौं हामी । तेज र प्रतिभारश्मि भाउजू हामीभन्दा तगडा देखिन्थे, ठम ठमहिँडेर केही अगि लाग्दै थिए उनीहरू । म श्रीमती लक्ष्मीलाई साथ दिँदै पञ्चमीको पाइला सार्दै थिएँ । लक्ष्मीको गहँ्रुङ्गो झोला प्रतिभा भाउजुृले बोकेर सघाउनुृ भए पनि उनलाई हिँड्न गाह्रो अनुभव हुँदै थियो । टिङ्ग्रे गाउँ नाघेपछि त उनलाई लेक लागिहाल्यो । भखैरै मुटुसम्बन्धी समस्याबाट मुक्त भएकीले चिकित्सकको  बिस्तारै हिँड्नु, जाँदा हुन्छ भन्ने सल्लाह पाएर मात्रै मुक्तिनाथ यात्राको आँट गरेका थियौं ।
तेज र भाउजु अगाडि गइसके । साँझ पर्नै लागेकोले होला बाटो लभग जनशून्य छ । पारिपाटि पहेँलै देखिने माटो र चट्टानी भिर–पहिरो मात्रै देखिन्छ । भिरका भित्तामा चमेरा, काग र गिद्धका गुँडयुक्त खोपैखोपा ! कतैकतै साना थुम्का बाहेक हरियाली कतै देखिँदैनथ्यो ।
लक्ष्मी हिँड्न नसकेर बाटोछेउमैं थचक्कै बसिहालिन । त्यो उचाइलाग्ने समस्याबाट मुक्तिपाउन अदुवा र टिम्बुर पनि चपाइन, स्वास लिन केही सजिलो भयो । त्यसपछि फेरि अर्को सकस्याले समात्यो– पिँडुला फर्केर हिँड्नै नसक्ने भयो उनलाई । धेरै अग्लो पनि होइन, ३ हजार २ सय मिटर मात्र थियो यो ठिङ्गे वा  खिङ्ग्रीको उँचाइ ! अझै ५०२ मिटरमाथि चढ्नुछ मुक्तिनाथको मन्दिर भेट्न । नअगाडि जानुृ, न जोमसोम फर्कनु ! 
अँध्यारोको बर्कोले धरतीलाई आफ्नो कालो छायाँभित्र बिस्तारै लुकाउँदै थियो । झारकोट  नपुगी बस्ती कतै देखिँदैन । मनमा अत्यासकोपहिरो जााँदैछ । लक्ष्मीलाई भर दिँदै घिस्रिएरै भए पनि झारकोट पुग्नुको विकल्प छैन । केही माथि घिस्रिँदै पुगेपछि त लगभग बेहोसै भएर लडिन् लक्ष्मी । मुटुको बिरामी । मन आत्तियो, कतै अर्धांङिगीनीसँगको विछोडको पीडा बोकेर त फर्कनु पर्ने होइन घर । स्निफर सुँघाउँदै बु्रफिन ख्वाएर हात गोडामा हलुका मसाज गरेपछि बिस्तारै होसमा आइन उनी । उनको त्यो अवस्थासँगै आँखा रसाए खुशीले र उनले होइन, आफू स्वयम्ले पुनर्जीवन पाएजस्तो अनुभव गरेँ मैले । ओफ....मान्छे कसरी एकै क्षणमा एक युगको भन्दा बढी पीडा अनुभव गर्न पुग्दोरहेछ ! कसरी निमेषभरमा पीडाको अग्निसागर छिचोल्न पुग्दो रहेछ । त्यही एकक्षणले मलाई राम्ररी महसुस गराएको थियो ।
“ल न, विरामी परेर विचल्लीमा परियो । माथि होटेलसम्म लगिदिनोस् न !”
एकजना स्थानीय मान्छे एउटा रित्तो घोडा डोहो¥याउँदै आएको देखेर जागेको आशा पनि “घोडामा काठी छैन, काठी नभएको घोडा तिमीहरू चढ्नसक्दैन ।” भन्दै उसले बाटो तताएपछि निराशामा बदलिएको थियो । हुनपनि घोडामा काठी थिएन । त्यसैले काठी नभएको घोडामा उकालो चढ्नु सजिलो थिएन । त्यसमाथि जिउ नै थाम्न नसक्ने बिरामी मान्छे ! तर पनि उसले अरु केही सहयोग गर्न सकिन्छ कि भन्नेसम्म नसोधी टाप कसेको देख्दा भने मनमा नमीठो प्रश्न उठेको थियो– के अलिकति पनि मानवता बाँकी छैन मान्छेमा ? 
मेरो प्राथमिक उपचारले केही काम गरेछ । लक्ष्मी केही तङ्ग्रेर बिस्तारै उठेर हिँड्ने कोशिस गर्न थालिन । अर्को उपाय पनि थिएन । पञ्चमीको पाइला चाल्दै केही माथि पुग्दा तेज झारकोट पुगेर एउटा होटेलमा बासको व्यवस्था मिलाइवरि हामीलाई नै खोज्दै आएपुग्यो । । अनि अरु ढुक्क लाग्यो कमसेकम बासको त व्यवस्था भयो । बास पनि नपाइएको भए ? एकातिर तेजले, अर्कातिर मैले भरदिएर बल्लतल्ल लक्ष्मीलाई प्रकाश लजसम्म पु¥यायौं ।
होटेल पुगेर तातोपानीको सेकाइ, कोठाभित्रको तातो वातावरण र तातो चियाको गर्माहटको असर अनि औषधिका रूपमा मार्फाको थोरै सेवन गरेर लक्ष्मी विछ्यौनामा आरामगर्न सुतेपछि बल्ल होटेलको वातावरणमा भिज्न हामी तल ओर्लियौं ।
प्रकाश लजका मालिक थिए छेवाङ आङमा गुरुङ । मिज्यासिला र सहयोगी । श्रीमती अमेरिका पुगेको बेला कुक तालिम लिएर आएपछि खोलेका रहेछन् यो प्रकाश लज । उनीपनि फरासिली थिइन । जेठो छोरा त्यहीँ थियो, पोखरामा आठ कक्षा पढ्दै रहेछ । अहिले विदामा आमाबाबुलाई सघाउन भनी घर आएको । छोरी काठमाडौतिर बौद्धमा छात्रवृत्ति पाएर त्यहीँको गुम्बामा बसेर शिक्षा लिँदै छन् रे । अर्थात आनी बन्ने तर्खरमा लगाएका थिए उनलाई । होटेलको त्यो वातावरण सफासुघ्घर । खाना मीठो र स्वादिलो । चारकोठाको होटेलमा दुईवटा हामीले कब्जा ग¥यौं, अर्को एउटामा स्विस केटाकेटीको जोडी र अर्कोमा दुईजना झुमा केटी अर्थात् आनी ! त्यतातिर गुरुङ र शेर्पा जातिमा माहिली छोरीलाई सानैमा गुम्वा पठाएर आनी बनाउने पुरानै चलन थियो । तिनै आनी कतै मन्दिरमा झुमा बनेर र कतै गुम्बामा आनी बनेर देवपुत्रीका नाउँमा गुृरू र विद्यार्थीहरूको सेवा गरेर जिन्दगी बिताउँछन् । तिनका यौवनका उन्मादहरू सबै सपनामा स्खलित हुन्छन् तिनै गुम्वा र देवमन्दिरमा ।
होटेलमा खान र खुट्टा डुबाएर थकाई मार्न पर्याप्त तातोपानी उपलब्ध थियो । तल लबीमा एउटा ठूलो टेबलमुनि भर्भर आगो बलिरहेका परम्परागत अँगेनो थियो । त्यसको वरिपरि घुँडासम्म कम्बलले छोपेर आरामपूर्वक जिउ तताउन बस्ने आसन थिए । जापानी परम्परागत होटेलमा देखेको थिएँ यस्तै अँगेनो, हामी कहाँ  यहीँ देखियो ।
विहान उठ्दा लक्ष्मी लगभग तयार भैसकेकी थिइन् माथि मन्दिर उक्लन । पूरै त के ठीक हुन्थ्यो, यहाँसम्म आएर पनि मन्दिर पुग्न नपाइएला भन्ने त्रासले गर्दा सायद आत्मबल बलियो बनाएकी थिइन उनले !
सिंगो झारकोट र मुक्तिनाथ क्षेत्र पूरै हिउँको चिसो सिरेटो र ओसिलो वातारणमा निथ्रुक्क भिजेको थियो । रानीपौवाको सुन्दर प्रकृति र अलि विकसित खालको पूरै ब्युँझिनसकेको बजारबस्ती नाघेर हिन्दु र बौद्ध दुवै सम्प्रदायकाले उत्तिकै श्रद्धा गर्ने धार्मिक सहिष्णुताको प्रतीक मानिँदै आएको मुक्तिनाथ पुग्दा पनि घटेको थिएन उनको आत्मबल । अर्धवृत्ताकार रूपमा रहेका १०८ धारा मुक्तिनाथ, नरसिंह अवतार, ज्वालामाई, शिवमन्दिर, पातालगङ्गा आदिलाई पृष्ठभागमा राखेर हिउँ झैं चिसोपानी ओकलिरहेका थिए । आँटिला धर्मभिरु तीर्थयात्रीहरू त्यो चिसो हिमजलमा थुर्थुराउँदै स्नान गरिरहेका दृश्य साँच्चिकै आँटिलो दृश्य लाग्थ्यो । नसक्ने हामी हातले एकदुई धाराको पानी थापेर शिरमाथि सेचन गर्दै स्नान गरेको बहाना गथ्र्यौं ।       
जे होस्, बिस्तारै मन्दिर पुगेर दर्शनगरी होटल फर्कन देखाएको लक्ष्मीको आत्मबल प्रशंसनीय थियो तर यो भिरालो बाटो हिँडेर जोमसोम पुग्नु लक्ष्मीका लागि अब सम्भव थिएन । त्यसैले अघिल्लै दिन घोडाको व्यवस्था गर्न भनेकोले एउटी पाारसिली किशोरी कासाङ तम्तयार रहिछे होटेल पुग्दा । खानपिन गरेर बिदा भयौ ंमुक्तिनाथको त्यो मनोरम काखबाट ।
किशोर वयमैं पढलेख छाडेर बूढा बाबुआमा र ससाना भाइबहिनी स्याहार्दै बसेकी त्यो किशोरी परिवारमा एक्ली कमाउ सन्तान थिई । गुरुङ बाबु र क्षेत्री आमाकी सुन्दर छोरी कासाङ वर्षभरि मुस्ताङमा दुःखजिलो गर्थी र हिउँद लागेपछि समूहमा भारत पसेर जरीबूटी आदिको व्यापार गर्थी परिवार पाल्न । लक्ष्मीलाई उसको जिम्मा लाएर चिन्तारहित थियौं हामी, जोमसोमको प्रत्यागमन यात्रामा । उसैले खोजेर जिम्मा लाएकी मुक्तिनाथ लजमा पुगेर सरसामान बिसाएका थियौं । 
अब अर्को समस्या आइलाग्यो मेरोलागि । जोमसोमसम्म घोडामा आइपुगे पनि लक्ष्मीका लागि पहिले सोचेजस्तै घोडेपानी भएर हिँड्दै जाने कुरा सम्भव थिएन । अब केगर्ने ? तेज र म दुवैको मुक्तिनाथ यात्राको उद्देश्य तिर्थाटन मात्र थिएन । त्योभन्दा बेसी नयाँ ठाउँको यात्राबाट अनुभव बटुल्नु र पछि सकेको नियात्रात्मक संस्मरण लेख्नु थियो । यसको लागि प्लेन र बसको यात्रा त्यति सघन हुन सक्दैनथ्यो ।
त्यसैले मेरो कारण तेज पनि यो अवसरबाट वञ्चित नहोस भनेर भनेको थिएँ– हामी प्लेनको टिकट पाएपछि पोखरा हुँदै काठमाडौं फर्कन्छौं, तिमी जाऊ न त पहिलेकै यो्जना अनुसार !
हामीलाई छाडेर फर्कन के मान्थ्यो तेजको मनले ? यस्तो यात्रामा तेज मित्र मात्र होइन, सधैं एउटा परिपक्व र जिम्मेवार अभिभावकका रूपमा समेत प्रस्तुत हुनेगर्छ ! अनि सुरु भएथ्यो हाम्रो पोखरासम्म पुग्न प्लेनको चारवटा टिकट खोज्ने महायुद्ध !
त्यतिबेला आर.एन.एसी. र साङ्ग्रिलाको उडान मात्रै थियो जोमसोममा । दिनको एक एक उडान हुन्थे । दश एघार बजेपछि कडा हावा लाग्ने भएकोले त्यसभन्दा पछि विमान अवतरण सम्भवै थिएन । त्यसैले टिकट पाउनै मुस्किल । जतिबेला गए पनि “बुक भैसक्यो, भोलि आउनोस्, हुन्छ कि हेरौंला ।” भन्दै फिर्ता पठाउँछन् । भित्रभित्रै मुर्मुरिएर फर्कनु बाहेक के पो गर्न सकिन्थ्यो र ? मजबुरीका नाम महात्मा गान्धी ! छैन भनेको टिकट ब्ल्याक मार्केटमा सजिलै पाइने कुराको हामीले भेउ नै पाएनौं ।
त्यो टिकट खोजको कोलम्बस अभियान बल्ल बल्ल टुङ्गियो । बिचल्ली परेका हामी यात्री १८ जना पुगिसकेका रहेछौं । त्यसपछि बल्ल हामीमाथि दया पलाएर हो वा विशेष उडानको दुईगुना मूल्यबाट हातलागी हुने थप कमिसनको आकर्षणले हो, आर.एन.एसी.का कर्मचारीहरूले बल्तल्ल एउटा विशेष अर्थात् चार्टर्ड उडानको व्यवस्था गरिदिए । त्यसपछि पछि बल्ल ढुक्क हुन पाएका थियौं !
मुक्तिनाथबाट फर्केको तेस्रो दिन बल्ल फर्किने तय भयो त्यो विशेष उडानबाट । पैसा बुझाइयो, टिकटको कुरै छैन । भोलिपल्ट विमान आयो, कर्मचारीले लाम लगाएर भित्र पसाए– अझै पनि टिकटको कुरै छैन !
कत्ति गर्दा पनि हात परेन टिकट र बिना टिकट सम्पन्न भयो जोमसोम–पोखराको अविश्मरणीय हवाइयात्रा !
धन्न केही भएन ! कुनै दुर्घटना हुन पुगेको भए बेवारिसे मृत्यु मर्ने रहेछौं हामी । न नाम, न परिचय । विमा रकम पाउने त कुरै भएन !
विजय निवास, आरुबारी ।

Tuesday, February 6, 2018

त्यो त भइहाल्छ नि...! –विजय चालिसे

 
धन्यवाद, मधुपर्क ! धन्यवाद श्रीओम, तुलसीजी ।
(मधुपर्क पूर्णाङ्क ५८५, २०७४ फागुन अङ्कमा प्रकाशित कथा)
“गाउँघरमा आफ्नै उमेरका साथीभाइ ओच्छ्यानमै गुडुल्किइरहने बेला बिहान पाँच बजेदेखि हामी बालभिक्षुको दिनचर्या शुरु हुन्थ्यो ।” पासाङ हामीसामु विगतस्मृतिका बिस्कुन फिजाउन आफैंलाई तयार बनाउँदै थिई ।
छरितो शरीर, हाँसिरहेजस्ता चाम्किला पानीदार अँखा, हिउँरङको गोरो अनुहारको बीच गालाका दुबै पट्टी पाकेका मुस्ताङ्गी स्याउ झैं रक्तिम आभायुक्त फक्रँदो जवानी । पासाङको आकर्षणबाट जो कोहीलाई पनि उम्कन कठिन पथ्र्यो । गाढा रातो अर्थात मरुन रङ्गको मुख्य अङ्गबस्त्रभित्र पहेँलो रङ्गको बाँकटे भोटोको एकनास तेङ्गाकोे पोशाकले गोरो हिमाली कसिलो व्यक्तित्वलाई झनै आकर्षक तुल्याउन सफल थियो । महझैं मीठो बोली र निश्छल प्राकृतिक हिमाली सौन्दर्यको मोहनीयुक्त आकर्षण, साँच्चिकै चमत्कारपूर्ण लाग्थ्यो उसको सौन्दर्य । विजुली चाल र मिजासिलो, मधुर व्यवहारले ममात्र होइन उसलाई देख्ने जोकोही यसरी नै मोहनी आकर्षणमा डुब्न पुगेका थियौं । साँच्चैकी हिमकन्या वा महादेवजस्ता फक्कडलाई समेत मायामोहमा आकण्ठ डुवाउन सक्ने रुपसी पार्वतीको प्रतिरूप लाग्दै थिई त्यो केटी तर परम्पराको कठोर साङ्लोमा बाँधिएकी ऊ भने कसैको प्राप्तिमा तपस्यारत किन्नरकन्या थिइन, सम्पूर्ण मानवीय चाहनालाई आफैंभित्रको अन्धगुहामा धकेल्न वाध्य एउटी प्रतिनिधि युवती मात्र थिई ।
हामी यतिबेला उत्तरी हिमाली भेगको एउटा विश्रामगृहमा थियौं । विश्रामगृह पस्नासाथ एउटा ठूलो साझा कोठा थियो । त्यही साझा पहुना कोठाको बीचतिर चार–छ वटा काठका कुर्सी गोलाकार रखिएका थिए । कुर्सीहरूको माझ टेबिल र टेबिलमुनि गहिरो खाडल देखिन्थ्यो । त्यही खाडलमा भर्भराउँदो गरी बलिरहेको गोलको आगाको रापले पूरै कोठ मज्जाले तताएको थियो । हामी अगेनाको वरिपरि गोलाकार राखिएका कुर्सीमा न्यानो ताप्दै तातो चियाको रमरम आनन्द लिइरहेका थियौं । झ्यालबाट सुुटुक्क छिरेको साँझपखको अस्ताउँदो कलिलो घाम झ्यालको सिसाबाट छिरेर कोठामा छरिएको थियो । त्यसरी छिरेको अस्ताउँदोे घामको रक्तिम सिंदूरे आभाको लुकामारीले वातावरण अरू रोमाञ्चक लाग्थ्यो । अझ लुकामारी गरिरहेको सिन्दूरे घामले यताउता फ¥याक फरुक गरिरहेकी सुन्दरीको गाला चुम्दा झनै मादकता छरिएको थियो उसका निर्दोष र निश्छल हिमाली सौन्दर्यमा । उसलाई भने ती कुनै कुराको मतलब थिएन । ती सबै कुराबाट पूरै अनभिज्ञ देखिन्थी त्यो भिक्षुणी अर्थात, आनी !
पदमार्ग छेउको यो विश्रामस्थल अर्थात प्रचलित भाषाको लजकी मालिक्नी उसकी ठूली आमा थिइन । ठूलोबाबु दावा गुरुङ प्रायः पोखरा वा भारतका सीमावर्ती शहरहरूमा हिमाली जडीबूटीको व्यापार गर्न जान्थे । विश्रामगृहको सम्पूर्ण जिम्मेवारी ठूलीआमाकै काँधमा थियो । कहिलेकाहीँ गुम्बाबाट छुट्टी पाउँदा ऊ पनि ठूली आमाकहाँ एक दुई रात बिताउन आउने गर्थी । अनि आएको बेला ठूली आमालाई सघाउने काम त स्वाभविकै भइ हाल्यो । आज यस्तै मौका परेको थियो सायद । लजमा हमी बाहेक अरु पनि पाँच–सातजना पाहुना थिए । सबैलाई खाना, चिया र अरु फर्मायसी बस्तु तयार गर्ने र ओसार्ने काममा ठूलीआमालाई सघाइरहेकी थिई ऊ ।
“तपाइँ त भिक्षुणीजस्ती देखिनुहुन्छ । यो लजमा किन नि ?” हामीमध्ये कसैको जिज्ञासामा बिस्तारै खुल्दै गएकी थिई ऊ । त्यो पनि एकैपटक होइन, किस्ताबन्दीमा । शुरुमा त बोल्नै चाहेकी थिइन । हुनसक्छ हाम्रो सामान्य र शालिन व्यवहारका कारण होला, बिस्तारै खुल्न थालेकी ऊ ।
“म आनी हुँ, यहीँ नजिकै गुम्बामा बस्छु । गुम्बाको रेखदेख, सरसफाइ र पूजापाठमा जीवन बित्छ सर !” यसरी बिस्तारै हामी उसको विगत र वर्तमानमा प्रवेश गरिरहेका थियौं । विगतस्मृति गर्दा जीवनजस्तै उसको अनुहारमा पनि उतारचढाव देखिन्थे । कहिले उज्यालो आभा फैलँदै जान्थ्यो, कहिले पीडाको ग्रहणले अनुहारको उज्यालोलाई खोसिदिन्थ्यो ।
ऊ आमाबाबुकी माहिली छोरी थिई । उसभन्दा माथि दाजु पेम्वा थियो, पछाडि बहिनी कासाङ । माहिली छोरीलाई देवदासीको रूपमा गुम्बा पठाउने पहिलेदेखि कै चलन थियो । यसरी त्यही माहिली छोरी हुनुको नियति भरजीवन भोग्न अभिशप्त थिई ऊ भिक्षुणीको रूपमा सबै नारीसुलभ चाहनालाई बलि चढाएर ।
“हो...., गाउँघरमा हामै्र उमेरका केटाकेटी उठेका पनि हुँदैनथे । गुम्वामा हामी सात–आठ वर्ष उमेरका बालभिक्षुहरूको दिनचर्या विहान पाँचैबजेबाट शुरु भइसक्थ्यो । त्यसभन्दा अगाडि नै नित्यकर्म सकेर हामी दुई घण्टालामो प्रातकालीन प्रार्थनाका लागि गुम्बाको अग्रभागमा भेला भइसक्नु पथ्र्यो । त्यहीँबाट शुरु हुन्थ्यो हाम्रो दैनिक जीवन । मरुन रङ्गको मुख्य अङ्गबस्त्रभित्र पहेँलो रङ्गको बाँकटे भोटोको एकनास तेङ्गो पोशाकमा सजिएका हामी बाहिरकाले हेर्दा भने एउटै लाग्थ्यौं सायद ! कुनै अलग परिचय थिएन हाम्रो । गुम्बाको फराकिलो प्राङ्गणमा लाम लागेर प्रार्थना सक्नासाथ अर्को लाम शुरु हुन्थ्यो– कौलाका लागि । कौला खाइसक्दा नसक्दै साढे आठ बजेत फेरि पढ्नको लगि आ–आफ्नो कोठामा पुगिसक्नुपथ्र्यो ।”
उसको आँखामा कहिले वाल्यकालीन जीवनमा भोगिएका सीमित खुशीका क्षणले छाडेका उज्याला रेखा छरिन्थे, कहिले सानैमा बाबुआमाको काखबाट खोसिएर गुमाएको वात्सल्य प्रेमको अभावसृजित वाल्यमनोभावजन्य पीडास्पद अनुभूतिका धूमिल ग्रहण । त्यो देखेर अपराधबोधले समेत चिमोट्न खेज्दै थियो हामीलाई – किन बेकारमा कोट्याएछौं उसको विगत !
आमाको न्यानो काखबाट खोसिएर गुम्बाको कठोर अनुशासित जीवनमा प्रवेश गरेका शुरुका दिन त उसलाई चरीजस्तै भुर्र उडेर कहिले आफ्नै घरगाउँ पुगूँजस्तो हुन्थ्यो । हरबखत घरको यादले सताइरहन्थ्यो । आमा भेट्न आउँदा कतिपटक रुँदै पछि नलागेको पनि होइन । आमा भने ललाइफकाइ गुम्बैमा छाडेर जान्थिन । आमाले छाडेर गएपछि धेरै बेर गुम्बाको एउटा कुनोमा रुँदै बस्थी ऊ । महिनौ महिनापछि बल्ल अभ्यस्त हुँदै गएकी थिई गुम्बाजीवनसँग ।
“त्यतिबेला आमाले आफूलाई मायानै गर्दिनन् भन्ने लाग्थ्यो । त्यसैले आँसु लुकाउँदै गएकी आमाको कोमल मनको चित्कार समेतको अनुमान गर्न सकेकी थिइन मैले । धेरै पछि मात्रै बुझेँ – उसकोजस्तो गरिव परिवारमा सन्तान पाल्नुको बोझ कम गहु्रङ्गो थिएन । त्यही बोझबाट बच्नका लागि यस्तै उपाय नै त बाँकी रहन्थ्यो ! हुन पनि आनी वा झुमा र लामा बन्न गुम्बामा पस्ने सबै नै गरीबबाबुआमाका छोराछोरी हुन्थ्यौं । मेरो परिवार पनि यस्तै थियो । भाइ सानै थियो । बाबु वषर््ाभरिको सामल थेग्न पुग्ने कमाइ गर्न आठ महिनाजति घरवरिपर नै सामान खेप्थे । हिउँदमा मङ्सिरदेखि फागुनसम्मका चार महिना हिउँलले बाहिर निस्कनै सकिँदैनथ्यो । हिउँले गर्दा त्यता हुँदी काम पाइँैनथ्यो । पाए नै पनि घरबाहिर निस्कनै नसकिने चिसोमा काम गर्न सक्ने कुरै भएन । त्यसैले हिउँदको बेला उनीजस्ता धेरै मानिस इण्डियातिर लाग्थे । त्यताहँुदो व्यापार वा काम गरेर लाइखाई जोगिने १०–१५ हजार रुपियाँ पनि ठूलै आमदानी ठानिन्थ्यो । तानतुन गरी यसरी नै वर्षदिनको घरखर्च चल्थ्यो ।”
उसको मात्र नएर हिमाली भेगमा बस्ने उसका जस्ता सबै गरीब परिबारको साझा नियति थियो यो । गाउँठाउँमा सामान बोक्ने काम नपाएपछि हिउँद लाग्नासाथ गाउँ रित्तिन्थ्यो । सक्नेजति अबैंसे, बूढापाका र तन्नेरा–तन्नेरीहरु प्राय भारत वा नेपालकै विभिन्न ठाउँतिर लाग्थे । भारत पुगेर केही भाँडामाझ्ने काममा लाग्थे, केही धनी मानी भारतीयको मोटर सफागर्ने काम फेला पार्थे । कोही होटलमा काम पाउँथे, कोही यतैदेखि जम्मा गरी लगेको हिमाली जडिबूटी र शालिग्रामहरुको व्यापार गर्थे । केही वर्ष यतादेखि भारतीयहरू नै यता आएर ती बस्तुको व्यापार गर्न थालेकाले जडीबूटी पनि त्यति बिक्दैनथ्यो । येनकेन चार–पाँच महिना उतै बिताएर धेरैजसो घर फर्कन्थे, कोही उतै बस्थे । त्यसैले गाउँमा बूढाबूढी र साना नानीहरु बाहेक कोही भेटिँदैनन् । हिउँले सबै ढाकेर घरबाहिर निस्कन नसकिने हुनाले हिउँ नपग्लिन्जेलका लागि पुग्नेगरी घरभित्रै पीठो, चिया, सात्तु आदि खानेकुराहरुको व्यवस्था गरिन्थ्यो । त्यही खाएर बूढाखाडा, केटाकेटी र थोरै जवान युवा युवती घरभित्रै बस्थे । खाने पानीसमेत घरको छानाको सानो दूलो पारेर हिउँ झार्दै पगालेर जम्मा गर्नु पथ्र्यो ।
बाबुआमा एकप्रकारले सुकुम्बासी थिए, घडेरी बाहेक खेतबारी केही थिएन । हुने कै पनि फापर, जौजस्ता हिमाली हावापानीमा उब्जने थोरै उब्जनीले वर्षदिनको गुजारा चल्दैनथ्यो । त्यसैले बाबु आमाले पनि मन नमान्दा नमान्दै पठाएका थिए होलान्, उसलाई गुम्बा ।
“त्यसमाथि म परेँ, माहिली छोरी । माहिली छोरीलाई देवदासीको रूपमा गुम्बा पठाउने पहिलेदेखि कै चलन थियो । छोरीलाई गुम्बा पठायो भनेर कसैले औला उठाउने कुरा पनि थिएन ।” ऊ विगतस्मृतिमा पूर्णतया हराइरहेझै लाग्थी । आँखा शून्यमा कतै एकोहोरो गडिरहेका थिए । लाग्थ्यो ऊ वर्तमान छिचोलेर वाल्यकालीन संसार नियालीरहेकी छ ।
“एकरस जीवन बित्यो बाल्यकालमा । दिउँसोको खाना खाएपछि अपरान्हतिर चियाको लागि घण्टी बज्थ्यो । हामी चिया खाने कोठामा लाम लाग्थ्यौं । लगभग सात–आठ वर्षउमेरका हामी केटाकेटीहरू सबै नै सामान्य बालजीवनबाट अलग्याएर बुद्धका अनुयायी बनाउन समर्पित गरिएका जीव थियौं । चाहना विपरित बलात समर्पित बलि ! चियाको समय सकिएको घण्टी बज्थ्यो । हामी फेरि अध्यनका लागि हतार हतार कोठातिर लाग्थ्यौं । साढे चार–पाँच बजे कक्षा सकिए पछि बल्ल बालसुलभ प्राकृतिक संसारमा हराउन र बालस्वरुपमा फर्कन केहीबेर मुक्ति मिल्थ्यो । रातको आठ बजे त विछ्यौनामा पुग्नु परिहाल्थ्यो ।” केही बेर रोकिएर लामो निश्वास छाड्छे ऊ ।
उसका आँखामा विगतकालीन कहालीलाग्दो अन्तरपीडाका मसिना धर्साहरू देखापर्दै जान्छन् । “ठूला धार्मिक मेला बाहेक गुम्बा छाडेर बाहिर निस्कने अनुमति हुँदैनथ्यो । शनिबार एक दिन केहीबेर टेलिभिजन सम्म हेर्ने पाइन्थ्यो, नत्र आधुनिक मनोरञ्जन के हो उसलाई थाहै थिएन । जाडोमा अघिपछि तेङ्गोमाथि ज्याकेट खाप्न पाइए पनि पूजापाठको बेला त्यै पनि लाउन पाइँदैनथ्यो । जाडोले धामी कामेझैं काम्दै पूजामा बस्नुपथ्र्यो ।”
सुन्दैमा पनि द्रवीभूत हुन पुगेका थियो हाम्रो मन । ओहो कसरी खोसिन्छन्ं बल्यकाल मेरा देशका गरीब शिशुहरूको । कुनै जात वा जतिको मात्र होइन यो खोस्ने–खोसिने नियति । हिमाली डोल्मा र पासाङहरू मात्र होइन सुदूर पहाडी राधा, सीता वा गीताले भोगिरहेका नियति पनि यही हो । गरिवी र अज्ञानले परम्पराका नाउँमा तिनका वाल्यकाल मात्र नभएर नारीसुलभ हरेक चाहना र जैविक आवश्यकता समेत खोसिइरहेको छ । चाहे, आनी वा झुमाको् नाउँमा होस्, चाहे देवदासी वा देवकन्या वा देवदासीको नाउँमा– अझै धेरै छन् मैले जोगाएका विकृत विसङ.्गत परम्पराका शिकार ।
“साँच्चै कति कठोर जीवन विताएर आएकी छ हगि यो केटीले । त्यसैले होला, आगोमा पोलिएर निख्खर बनेकी शुद्ध सुनजस्तै लाग्छे यो केटी, कञ्चन, साँच्चिकै कञ्चन ।” उसको यो मोहनी आकर्षण र उसले भोग्दै आएको जीवन देखेर मेरो मुखबाट निस्किन पुगेका थिए सुस्तरी यी शब्द ।
“साह्रै अनुशासित र कठोर थियो होला हगि गुम्वामा त्यतिबेलाको जीवन !” हामीमध्ये कसैले प्रश्न ग¥यो ।
त्यो प्रश्नपश्चात पूर्वस्मृतिमा हराउँदै गई ऊ । उसका दृष्टि सुदूर भूततिर केन्द्रित हुँदै गएझैं लाग्दै थियो । कथावाचकको रूपमा आफ्नै पूर्व कथाको पारायण गर्दै थिई ऊ– हो त कति नरमाइला थिए ती दिन ! सधैं विहान पाँचै बजे उठ, नित्यकर्म सकाउ, विहानको कौलाका लागि लाम लाग । केहीबेर कसरत गर र लामो पट्यारलाग्दो कक्षमा बस । न आफूलाई मन परेको खान पाइन्थ्यो न खेल्न र घुमघाम गर्न । घर समेत वर्षमा एक दुई पल्ट चाडबाडमा मात्रै देख्न पाइन्थ्यो ।
“ओहो, निकै कठोर पो छ हगि गुम्बाको जीवन !” गुम्वाका बानलभिक्षुको दिनचर्या बारे उसले सुनाएका कुरा सुनिरहँदा हाम्रा अगाडि आफ्नै छोराछोरी झल्झली देख्दै थियौं । जो हरबखत वात्सल्यमा सरोबर छन् ।
“आनी र भिक्षु–भिक्षुणीहरूले घरजम गर्न हुँदै रे हो ? यस्तै भन्ने सुनेका थियौं हामीले, हो त ?” आफूले सुनेको कुराको आधारमा जन्मेको जिज्ञासा थियो यो ।
“हो, हामीलाई गुम्वा पसेपछि नै बिहे नगर्नें, एक छाक मात्रै खाने र शीलको पालना गर्ने कुरा सिकाइयो । ्त्यसरी सानैदेखि पालना गर्न सिकाइएको पञ्चशील नराम्रो पनि थिएन । त्यो भनेको हामीले गर्न नहुने पाँच वटा कुरा नै त हो । पालना गर्नु पर्ने ती आचरण झुठो नबोल्ने, जाँडरक्सी नखाने, व्यभिचार नगर्ने, यौन समागम र चोरी नगर्ने हो ।”
अष्टशीलका सबै आचरण वास्तवमा राम्रा थिए, पालनायोग्य । ती मध्ये एउटा आचरणलाई भने हाम्रो दिमागले सहज रूपमा पचाउन सकिरहेको थिएन । सम्यक रूपमा पालना गरिने गृहस्थ जीवन र सम्यक यौन सम्बन्ध सृष्टिको निरन्तरता र सभ्यताको आधार होइन र ? व्यभिचार वर्जित मान्नु अत्यन्त उपयुक्त हो, तर सम्यक र सामाजिक दृष्टिमा स्वीकार्य शारीरिक सम्पर्क अर्थात यौन समागम ? त्यो त सृष्टिमा कुनै पनि जीवको जैविक आवश्यकता हो । सृष्टि र सभ्यताको निरन्तरता हो । यौन समागमको विरुद्धमा गुम्वाको प्रशिक्षण क्रममा जति नै नकारात्मक सोचको विकास गराइए पनि ती भिक्षुणीहरूमा मातृत्वको भोक र यौनको जन्मजात शारीरिक चाहना निर्मूल होला र ? यिनै शाश्वत प्रश्न मडराइरहेका थिए त्यतिखेर हाम्रो दिमागमा ।
यस्तो प्रश्न उठ्नुमा यता आएदेखि सुनिएका विभिन्न कुराको पनि योगदान थियो । सुनिन्थ्यो, यौनसम्बन्धको स्वीकृति नभएकोले प्राय भिक्षु–भिक्षुणी विबाह सम्बन्धमा गाँसिदैनन् । यता आएर भने बदलिँदो समयक्रमसँगै गुम्वाजीवनमा पनि केही खुला पन आएको छ । कहिले काहीँ गुम्वाका भिक्षु–भिक्षुणी पनि विवाह बन्धनमा बाँधिन थालेका छन् । यस्तै सुनेका थियौं हामीले ।
“हो, कहिलेकाहीँ यस्तो पनि देखिन्छ । हाम्रैं गुम्वाबाट पनि यसै वर्ष एकजना आनी साथीले गुम्वा जीवन त्यागिन् । मनमिल्ने भिक्षुसँग परिवार बसाल्न उनले गुम्वा छाडेकी थिइन ।” गाउँमा अरुबाट सुनेको कुराको उसबाट पनि यसरी पुष्टि भएपछि अपत्यार गर्ने कुरै भएन ।
“नरिसाउने भए एउटा कुरा सोधौं ?” उसको जवाफपश्चात सङ्कोच मान्दै दिमागमा मडराइरहेको जिज्ञासा मेट्न हामीबाट अर्को प्रश्न निस्कियो ।
“सोध्नोस् न । के हो त्यस्तो कुरा ?”
“गाउँघरमा आफूसरहका साथीसंगातीले काखमा नानी खेलाइरहेको देख्दा, विहे गरेर लोग्नेसँग सँगै हिँडेको देख्दा आफूलाई पनि बिहे गर्ने इच्छा जाग्दैन ? मन पर्ने कुनै युवकसँग जिन्दगी बिताउँजस्तो लाग्दैन ?” घुमाउरो प्रश्न गरेको थिएँ मैले । एउटी जवान केटीसँग सोझै यौन चाहनाको प्रश्न गर्नु निश्चय नै उपयुक्त हुँदैनथ्यो । त्यसैले परोक्षमा उसको मन चोर्ने प्रयत्न गरेका थिएँ ।
“त्यो त भइहाल्छ नि, हामी पनि त मानिसै हौं !”
अगेनोको आगोको राप र लुकेर उसको उन्नत भाल चुम्न कोठाभित्र पसेको अस्ताउँदा सूर्यको सिन्दूरे प्रकाशका साथै यो प्रश्नले फैलाएको अनुहारको रक्तिम आभा लुकाउन अर्कोतर्फ फर्किइ ऊ । सायद त्यसरी अनुहार लुकाउन खोज्नु आफूभित्रको शास्वत चाहना र वर्जित मातृत्वलाई अनावृत्त हुनबाट जोगाउने असफल प्रयास थियो कि ? हामी अनुमान मात्र गर्न सक्थ्यौं ।
विजय निवास, आरुबारी